October 7, 2022

प्रशांत किशोर का तिनका और कांग्रेस


जैसे डूबते को तिनके का सहारा होता है वैसे ही कांग्रेस को प्रशांत किशोर का सहारा है। प्रशांत किशोर के पास भी 2024 का चुनाव प्रभावी तरीके से लडऩे के लिए फिलहाल कोई विकल्प नहीं है, लेकिन वे कांग्रेस की तरह बेसहारा नहीं हैं। हालांकि यह भी सही है कि उनका पिछला प्रयास जब विफल हुआ था तो वे कांग्रेस की दर से ऐसे उठे थे, जैसे इस देश की मिट्टी से कांग्रेस के जैसा ही वे एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे! लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कांग्रेस भी उस समय मान रही थी कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसे दो-तीन राज्यों में जीत मिलेगी, लेकिन उसकी भी वह उम्मीद पूरी नहीं हुई। उसे पता है अगले लोकसभा चुनाव से पहले कम से कम दो-तीन राज्यों में उसे विधानसभा चुनाव जीतना होगा तभी वह लोकसभा का चुनाव लड़ पाएगी अन्यथा चुनाव से पहले ही उसकी लड़ाई खत्म मान ली जाएगी। इसलिए उसके पास प्रशांत किशोर का विकल्प आजमाने के सिवा अभी कोई रास्ता नहीं है।
दूसरी ओर प्रशांत किशोर का ममता बनर्जी से मोहभंग हो गया है और शरद पवार व नीतीश कुमार में उनको वह स्पार्क नहीं दिख रहा है, जिसके दम पर नरेंद्र मोदी के मुकाबले लोकसभा का चुनाव लड़ा जा सके। वैसे भी प्रशांत किशोर हमेशा कहते रहे हैं कि कांग्रेस जिस आइडिया और स्पेस का प्रतिनिधित्व कर रही है उसको विपक्ष की जरूरत है। सो, ऐसा लग रहा है कि 2024 के लिए वह आइडिया और स्पेस उनको मिलने जा रहा है। परंतु सवाल है कि क्या कांग्रेस में उनको वह मौका मिलेगा, जिसकी उम्मीद में वे कांग्रेस से जुडऩे या उसके साथ काम करने जा रहे हैं? प्रशांत किशोर अब तक ऐसी पार्टियों के लिए काम करते रहे हैं, जहां सिंगल कमांड चलती है। उन्हें दस जगह पंचायत करने की जरूरत कभी नहीं पड़ी है, जबकि कांग्रेस में उनकी शुरुआत ही पंचायत से हुई है।
प्रशांत किशोर ने नेहरू-गांधी परिवार के तीनों सदस्यों- सोनिया, राहुल व प्रियंका के साथ साथ सात और बड़े नेताओं के सामने अपना प्रेजेंटेशन दिया। इसमें उन्होंने बताया कि कांग्रेस को चार सौ से कम सीटों पर लडऩा चाहिए और बाकी सीटों पर रणनीतिक तालमेल करना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने कई रणनीतिक बातें भी समझाईं। इसके बावजूद तय हुआ कि सोनिया गांधी एक कमेटी बनाएंगी, जो सात दिन में बताएगी कि प्रशांत किशोर का प्रेजेंटेशन कैसा है और वह कांग्रेस के लिए फायदेमंद है या नहीं। सोचें, यह क्या बात हुई? उनके प्रेजेंटेशन में कोई रॉकेट साइंस नहीं था, जो वहां बैठे 10 नेताओं को समझ में नहीं आया। सब कुछ समझते हुए भी कांग्रेस आलाकमान ने फैसला एक हफ्ते के लिए टाल दिया। यह हर मामले में होगा। प्रशांत कोई प्रस्ताव देंगे और कांग्रेस कमेटी बनाएगी, कमेटी कई दिन तक उस प्रस्ताव पर बैठी रहेगी और फिर कुछ नेताओं के निजी हितों को ध्यान में रखते हुए रिपोर्ट दी जाएगी। ऐसी स्थिति में प्रशांत किशोर का सफल होना संदिग्ध है। कांग्रेस अगर उन्हें खुली छूट दे तभी वे कोई सकारात्मक नतीजा दे सकते हैं।
दूसरा सवाल है कि क्या प्रशांत किशोर कांग्रेस की किस्मत बदल पाएंगे? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि कांग्रेस पिछले कुछ समय से लगातार चुनाव हार रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से हारने के बाद से कांग्रेस एक भी चुनाव नहीं जीत पाई है। लोकसभा चुनाव के बाद पिछले तीन साल में 17 राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं और किसी भी राज्य में कांग्रेस अपने दम पर चुनाव नहीं जीत सकी है। तमिलनाडु और झारखंड में उसकी सीटों में कुछ इजाफा हुआ लेकिन वह सहयोगी पार्टियों के दम पर हुआ। महाराष्ट्र में भी वह सरकार में है लेकिन वह चुनाव बाद बनी परिस्थितियों के कारण हुआ। इसके अलावा ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस न सिर्फ हारी है, बल्कि उसका वोट प्रतिशत भी कम हुआ है। सोचें, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में, जहां प्रियंका गांधी वाड्रा ने पूरी ताकत लगाई वहां कांग्रेस को ढाई फीसदी से भी कम वोट मिले हैं। उत्तर प्रदेश का नतीजा कांग्रेस की बदहाली का सबसे बड़ा सबूत है।
उत्तर प्रदेश अकेला राज्य नहीं है, जहां कांग्रेस का वोट पांच प्रतिशत से कम रहा। पिछले तीन साल में जिन 17 राज्यों में चुनाव हुए हैं उनमें से पांच राज्य ऐसे हैं, जहां कांग्रेस का वोट पांच फीसदी से भी कम है। इसके अलावा पांच अन्य राज्यों में उसका वोट प्रतिशत 20 से कम है। सिर्फ सात ऐसे राज्य हैं, जहां उसे 25 से 30 फीसदी वोट मिले हैं। कांग्रेस की दुर्दशा बताने वाला एक तथ्य यह है कि इन 17 में से 12 राज्यों में कांग्रेस का वोट प्रतिशत कम हुआ। झारखंड में जेएमएम के दम पर और बिहार में राजद के दम पर उसका वोट शेयर बढ़ा। सिर्फ तीन राज्य- हरियाणा, केरल और उत्तराखंड ही ऐसे हैं, जहां कांग्रेस का अपने दम पर वोट शेयर बढ़ा लेकिन वह चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं था। ये आंकड़े इसलिए अहम हैं क्योंकि एक पंजाब छोड़ कर बाकी सभी राज्यों में कांग्रेस विपक्षी पार्टी के तौर पर लड़ रही थी। इसके बावजूद एंटी इन्कम्बैंसी का उसे कोई फायदा नहीं मिला। कई राज्यों में मतदाताओं ने उसे मुख्य विपक्ष के लायक पार्टी नहीं माना। इसलिए कांग्रेस के नेता भले बताते रहें कि कांग्रेस के पास अब भी सात सौ से ज्यादा विधायक हैं लेकिन उनको जमीनी हकीकत की जानकारी है।
प्रशांत किशोर को कांग्रेस की इस दुर्दशा का अंदाजा है। उनको पता है कि कांग्रेस के पास वोट की कोई बड़ी पूंजी नहीं है। लोकसभा चुनाव में मिले जिस 11-12 करोड़ वोट का हवाला कांग्रेस देती है उसमें से ज्यादातर वोट अल्पसंख्यकों का है और उनको भी अगर कोई विकल्प मिलता है तो उन्हें कांग्रेस को छोडऩे में समय नहीं लगेगा। इसके बावजूद अगर प्रशांत किशोर जोखिम ले रहे हैं तो उसका कारण यह है कि वे विपक्ष की एकजुटता के लिए कांग्रेस के आइडिया और उसके स्पेस को जरूरी मानते हैं। इसके अलावा उम्मीद की एक किरण यह है कि इस साल गुजरात और हिमाचल में होने वाले विधानसभा चुनाव से लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव तक दो राज्यों- राजस्थान और छत्तीसगढ़ को छोड़ कर लगभग हर जगह भाजपा सरकार में है। यानी वे ऐसी रणनीति बना सकते हैं, जिससे एंटी इन्कम्बैंसी का लाभ कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों को मिले। गुजरात में तो कांग्रेस लगातार छह चुनाव हार चुकी है। तीसरी अहम बात यह है कि वे भाजपा की हर रणनीति और उसकी ताकत व कमजोरी से वाकिफ हैं।
बहरहाल, अगर सोनिया गांधी की बनाई कमेटी एक हफ्ते विचार करने के बाद सिफारिश करती है तो प्रशांत किशोर कांग्रेस में शामिल होंगे और उसे 2024 का चुनाव लड़वाएंगे। ध्यान रहे अब तक के अपने राजनीतिक अभियान में वे सिर्फ एक बार उत्तर प्रदेश में विफल हुए हैं। उसके अलावा वे हर चुनाव में सफल रहे हैं। उनके इस रिकॉर्ड और इस छवि का लाभ भी कांग्रेस को मिलेगा। उसके कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ेगा और पार्टी से उम्मीद खो चुके नेता भी अलग होने से पहले दस बार सोचेंगे। उनसे मुकाबले के लिए भाजपा को भी अपनी रणनीति बदलनी होगी। सो, उनसे भाजपा को वास्तविक चुनौती मिलने की उम्मीद की जा सकती है।