January 29, 2026

खबर का असर: गरुड़ में उजागर हुआ “फर्जी डिलीवरी” का सच, प्रशासनिक हस्तक्षेप से 24 घंटे में पहुँचा सिलेंडर


गरुड़, बागेश्वर।
जिस मामले को कल तक गैस एजेंसी की लापरवाही और उपभोक्ता अधिकारों के खुले उल्लंघन का प्रतीक माना जा रहा था, उसी ने आज यह सिद्ध कर दिया कि जब जनहित की आवाज़ बुलंद होती है, तो व्यवस्था को झुकना ही पड़ता है। इंडियन ऑयल के अंतर्गत संचालित इंडेन गैस सेवा से जुड़े कथित “फर्जी डिलीवरी” और केवाईसी के नाम पर उपभोक्ता को गैस से वंचित रखने का प्रकरण जैसे ही आख़रीआंख डिजिटल मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ, उसका असर बिजली की गति से सामने आया।
जिस उपभोक्ता को दिसंबर माह में यह कहकर गैस सिलेंडर देने से इनकार कर दिया गया था कि उसका केवाईसी पूर्ण नहीं है, जबकि उसी के मोबाइल पर बार-बार “सिलेंडर सफलतापूर्वक डिलीवर” होने के संदेश भेजे जा रहे थे, आज उसी उपभोक्ता के घर 24 घंटे के भीतर गैस सिलेंडर पहुँचा दिया गया। यह घटनाक्रम न केवल खबर की ताक़त को दर्शाता है, बल्कि यह भी प्रमाणित करता है कि मीडिया द्वारा उठाए गए सवाल अगर तथ्यपरक और जनहितकारी हों, तो उनका असर अवश्य होता है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर प्रश्न यह था कि जब उपभोक्ता को वास्तविक रूप से गैस नहीं मिली, तो सिस्टम में डिलीवरी दर्ज कैसे हो गई। किसे वह सिलेंडर दिया गया, और किसके नाम पर रिकॉर्ड में प्रविष्टि हुई—ये ऐसे सवाल थे जिनका जवाब न तो गैस गोदाम के स्तर पर दिया गया, न ही डिलीवरी कर्मियों ने कोई स्पष्टीकरण देना उचित समझा। यही चुप्पी इस मामले को और अधिक संदिग्ध बनाती रही।
खबर प्रकाशित होने के बाद प्रशासन हरकत में आया। उपजिलाधिकारी गरुड़ के संज्ञान में मामला आते ही आवश्यक हस्तक्षेप हुआ और गैस एजेंसी को तत्काल कार्रवाई के लिए बाध्य होना पड़ा। परिणामस्वरूप आज सुबह उपभोक्ता को उसका हक़ मिला। सिलेंडर प्राप्त होने पर उपभोक्ता ने उपजिलाधिकारी गरुड़ तथा गैस गोदाम प्रबंधक संदीप चन्द्र के प्रति आभार व्यक्त किया, जिन्होंने समय रहते पहल कर समस्या का समाधान सुनिश्चित किया।
यह मामला केवल एक सिलेंडर की डिलीवरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक पीड़ा और असंतोष का प्रतीक है, जिसे क्षेत्र के अनेक उपभोक्ता लंबे समय से झेलते आ रहे हैं—चाहे वह बिना तौल के सिलेंडर देने की शिकायत हो या आधे-भरे सिलेंडर की आशंका। आज की यह कार्रवाई उन सभी उपभोक्ताओं के लिए एक संदेश है कि सवाल पूछना व्यर्थ नहीं जाता।
गरुड़ की यह घटना एक बार फिर यह रेखांकित करती है कि सरकारी सेवाएँ किसी का एहसान नहीं, बल्कि जनता के प्रति एक जिम्मेदारी हैं। और जब यह जिम्मेदारी निभाने में कोताही बरती जाती है, तो सजग पत्रकारिता और प्रशासनिक हस्तक्षेप मिलकर व्यवस्था को सही दिशा में लौटाने का काम कर सकते हैं। यह सचमुच खबर का असर है—जो न सिर्फ देखा गया, बल्कि महसूस भी किया गया।