अंकों से आगे की दुनिया: सीखना ही जीवन की असली परीक्षा
अर्जुन राणा
आज का समय प्रतिस्पर्धा, तुलना और परिणामों की अंधी दौड़ का समय बनता जा रहा है। परीक्षा का नाम आते ही विद्यार्थियों के मन में भय, अभिभावकों के चेहरे पर चिंता और शिक्षकों के भीतर परिणामों का दबाव दिखाई देने लगता है। अंकों को सफलता का एकमात्र पैमाना मान लेने की प्रवृत्ति ने शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को कहीं पीछे छोड़ दिया है। जबकि सच्चाई यह है कि परीक्षा जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि सीखने की यात्रा का एक छोटा-सा पड़ाव मात्र है।
वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति के भीतर सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता विकसित करे। केवल अधिक अंक प्राप्त कर लेना इस बात की गारंटी नहीं है कि विद्यार्थी जीवन की चुनौतियों का सामना कर पाएगा। आज की दुनिया में वही सफल है, जिसके पास ज्ञान के साथ-साथ कौशल भी हो। संचार कौशल, रचनात्मक सोच, समस्या समाधान क्षमता, नेतृत्व, टीमवर्क और तकनीकी दक्षता जैसे जीवन कौशल ही भविष्य की वास्तविक पूंजी हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर भी अब यह समझ विकसित हो रही है कि परीक्षा को भय का कारण नहीं, बल्कि आत्ममूल्यांकन का अवसर माना जाए। शिक्षा का उद्देश्य अब केवल रटकर उत्तर लिख देना नहीं, बल्कि विषय को समझना, उसका विश्लेषण करना और उसे जीवन में उपयोग करना है। नई शिक्षा व्यवस्था भी अनुभवात्मक शिक्षण, प्रोजेक्ट आधारित अधिगम और व्यावहारिक ज्ञान पर विशेष बल दे रही है, जिससे विद्यार्थी केवल किताबों तक सीमित न रहें, बल्कि जीवन के लिए तैयार हो सकें।
इस पूरी प्रक्रिया में अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि घर और विद्यालय का वातावरण सहयोगी और सकारात्मक हो, तो विद्यार्थी किसी भी परीक्षा को सहजता से पार कर सकता है। बच्चों की तुलना दूसरों से करना उनके आत्मविश्वास को कमजोर करता है और उनके भीतर हीन भावना को जन्म देता है। इसके स्थान पर उनकी मेहनत की सराहना करना, उन्हें प्रोत्साहित करना और उनकी रुचियों को समझना कहीं अधिक उपयोगी है।
विद्यालयों को भी अपनी भूमिका केवल परीक्षा परिणामों तक सीमित नहीं रखनी चाहिए। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य बच्चों का समग्र विकास है। खेल, योग, ध्यान और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ विद्यार्थियों के मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास और एकाग्रता को मजबूत बनाती हैं। एक संतुलित व्यक्तित्व ही जीवन की कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय ले पाता है।
डिजिटल युग में एक और चुनौती सामने आई है—मोबाइल और सोशल मीडिया की बढ़ती लत। यह न केवल विद्यार्थियों की एकाग्रता को प्रभावित करती है, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है। विशेष रूप से परीक्षा के समय डिजिटल उपकरणों का सीमित और उद्देश्यपूर्ण उपयोग ही उचित है। संतुलित दिनचर्या—पर्याप्त नींद, पौष्टिक भोजन, नियमित अध्ययन, छोटे-छोटे विश्राम, योग और ध्यान—विद्यार्थियों को तनावमुक्त और ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक होती है।
आज की शिक्षा प्रणाली भी केवल अंकों के आधार पर मूल्यांकन की पुरानी परंपरा से आगे बढ़ रही है। समझ, विश्लेषण, रचनात्मकता और व्यवहारिक ज्ञान को महत्व दिया जा रहा है। इसलिए विद्यार्थियों को भी अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा। उन्हें केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाने की चिंता से ऊपर उठकर सीखने की प्रक्रिया का आनंद लेना होगा।
जीवन में सफलता केवल परीक्षा परिणामों से तय नहीं होती। आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच, अनुशासन, समय प्रबंधन और निरंतर सीखने की आदत ही व्यक्ति को आगे बढ़ाती है। यह गुण किसी भी परीक्षा के अंकपत्र में नहीं दिखाई देते, लेकिन जीवन की हर परीक्षा में यही सबसे अधिक काम आते हैं।
विद्यार्थियों की सफलता के लिए अभिभावक, शिक्षक और विद्यालय—इन तीनों का समन्वय अनिवार्य है। यदि यह त्रिकोण मजबूत हो, तो कोई भी विद्यार्थी भय और दबाव से मुक्त होकर अपने सपनों की ओर आगे बढ़ सकता है।
परीक्षा जीवन की यात्रा का एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं। इसे डर या बोझ के रूप में नहीं, बल्कि सीखने, स्वयं को परखने और आगे बढ़ने के अवसर के रूप में स्वीकार करना ही सच्ची शिक्षा की पहचान है।
आइए, हम सब मिलकर यह सोच विकसित करें कि सफलता का अर्थ केवल अंक नहीं, बल्कि सीखने की क्षमता, समझ और जीवन कौशल है।
क्योंकि अंततः—अंक कुछ समय तक साथ देते हैं, पर सीख जीवन भर काम आती है।
