गरुड़ में पशुपालन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
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100 किलो बरसीम बीज के वितरण में भेदभाव के आरोप पर उठे सवाल, 100 किलो बरसीम बीज के वितरण में भेदभाव के आरोप
तहसील के अन्य पशु चिकित्सा केंद्रों को नहीं मिला बीज, पशुपालकों को बाजार से 200 रुपये किलो खरीदने की मजबूरी; जनप्रतिनिधियों ने निष्पक्ष जांच की उठाई मांग
अर्जुन राणा
गरुड़, बागेश्वर। किसानों और पशुपालकों की आय बढ़ाने तथा उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं। लेकिन इन योजनाओं का लाभ यदि जरूरतमंदों तक समान रूप से नहीं पहुंचे, तो सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसा ही एक मामला बागेश्वर जिले की गरुड़ तहसील के राजकीय पशु चिकित्सालय एवं कृत्रिम गर्भाधान केंद्र से सामने आया है। यहां बरसीम के चारा बीज के वितरण को लेकर क्षेत्रीय पशुपालकों में नाराजगी की बात सामने आई है। आरोप है कि शासन से प्राप्त 100 किलो बरसीम बीज का वितरण गरुड़ ब्लॉक के सभी पशु चिकित्सा केंद्रों के माध्यम से पशुपालकों तक पहुंचाने के बजाय केवल गरुड़ और उसके आसपास के क्षेत्र तक सीमित रखा गया। इससे दूरस्थ क्षेत्रों के पशुपालक कथित तौर पर सरकारी सहायता से वंचित रह गए।
मामले ने अब विभागीय पारदर्शिता, वितरण व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के चयन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों ने भी पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए जाने की आवश्यकता जताई है।
वर्षों से चली आ रही वितरण व्यवस्था में इस बार बदलाव का आरोप
प्राप्त जानकारी के अनुसार, राजकीय पशु चिकित्सालय गरुड़ को इस वर्ष पशुपालकों में वितरण के लिए कुल 100 किलो बरसीम चारा बीज प्राप्त हुआ था। आरोप है कि इस बीज को गरुड़ ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले विभिन्न पशु चिकित्सा उपकेंद्रों के माध्यम से वितरित किया जाना था, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों के पशुपालकों को भी इसका लाभ मिल सके।
स्थानीय स्तर पर बताया जा रहा है कि पूर्व के वर्षों में बीज को तहसील क्षेत्र के विभिन्न केंद्रों में बांटकर वितरण की व्यवस्था की जाती थी। इससे दूरस्थ गांवों में रहने वाले पशुपालकों को भी सरकारी दर पर चारा बीज उपलब्ध हो पाता था। हालांकि, इस वर्ष वितरण की व्यवस्था में बदलाव किए जाने का आरोप है।
पशुपालकों की शिकायत है कि बीज केवल गरुड़ अस्पताल और उसके आसपास के लोगों को वितरित किया गया, जबकि अन्य क्षेत्रों के पशुपालकों को इसका लाभ नहीं मिल सका। यदि वितरण की जिम्मेदारी पूरे ब्लॉक के पशुपालकों को लाभ पहुंचाने की थी, तो यह जानना जरूरी है कि अन्य केंद्रों को बीज उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया और वितरण का आधार क्या निर्धारित किया गया था।
द्योनाई से तिलसारी तक के पशुपालकों के सामने संकट
गरुड़ तहसील के अंतर्गत द्योनाई, जखेड़ा, वज्यूला, धैना, पाटली, शीर और तिलसारी सहित कई क्षेत्र आते हैं। इन इलाकों में पशुपालन ग्रामीण परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है। कई परिवार खेती के साथ-साथ गाय, भैंस और अन्य दुधारू पशुओं के पालन पर निर्भर हैं।
ऐसे में पशुओं के लिए हरे चारे की उपलब्धता केवल कृषि का विषय नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति से भी जुड़ी हुई है। बरसीम जैसे पौष्टिक चारे की खेती पशुपालकों के लिए उपयोगी होती है। यदि सरकारी सहायता के तहत मिलने वाला बीज सभी पात्र लाभार्थियों तक नहीं पहुंचता, तो इसका सीधा असर उन किसानों पर पड़ सकता है, जो सीमित संसाधनों में पशुपालन कर रहे हैं।
दूरस्थ क्षेत्रों के पशुपालकों का पक्ष सामने आना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि सरकारी योजनाओं का उद्देश्य केवल मुख्यालय के आसपास के लोगों तक सहायता पहुंचाना नहीं, बल्कि पात्र लाभार्थियों को समान अवसर उपलब्ध कराना है।
10 रुपये किलो का सरकारी बीज, बाजार में 200 रुपये किलो तक कीमत
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल बरसीम बीज की कीमत को लेकर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सरकारी व्यवस्था के तहत आधार कार्ड के आधार पर पशुपालकों को यह बीज लगभग 10 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया जाता है, जबकि बाजार में इसकी कीमत करीब 200 रुपये प्रति किलो बताई जा रही है।
यदि ये दरें संबंधित बीज की समान गुणवत्ता और मात्रा पर लागू होती हैं, तो दोनों के बीच भारी अंतर है। ऐसी स्थिति में सरकारी बीज से वंचित रह जाने वाले पशुपालकों को बाजार से बीज खरीदने पर काफी अधिक खर्च करना पड़ सकता है।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी पशुपालक को एक किलो बीज बाजार से 200 रुपये में खरीदना पड़े, जबकि वही बीज सरकारी व्यवस्था में 10 रुपये में उपलब्ध हो, तो दोनों के बीच 190 रुपये का अंतर होगा। सीमित आय वाले पशुपालकों के लिए यह अंतर भी मायने रखता है।
डॉक्टर शिवकुमार का क्या कहना है?
इस संबंध में आपके अपने पत्रकार अर्जुन राणा द्वारा राजकीय पशु चिकित्सालय गरुड़ के डॉक्टर शिवकुमार से संपर्क किया गया तो उनका कहना था कि मात्र 100 किलो चारा बीज को इतनी जगहों पर भेजना उचित नहीं था।
उनके इस कथन से वितरण व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है। यदि बीज की कुल मात्रा सीमित थी, तो क्या विभाग ने सभी उपकेंद्रों के बीच समानुपातिक वितरण, पशुपालकों की संख्या के आधार पर आवंटन अथवा किसी अन्य पारदर्शी व्यवस्था पर विचार किया था?
क्या विभाग ने पात्र पशुपालकों की संख्या और क्षेत्रवार आवश्यकता का आकलन किया था? क्या वितरण के लिए कोई लिखित आदेश या निर्धारित मानक थे? और यदि सभी केंद्रों तक बीज पहुंचाना संभव नहीं था, तो किन आधारों पर कुछ क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई?
यहाँ यह भी विशेष उल्लेखनीय हैं कि क्या इस स्तर पर भी कही नेतागिरी का दखल तो नही बढ़ रहा हैं?
क्या सीमित मात्रा के नाम पर दूरस्थ क्षेत्रों के पशुपालक रह गए वंचित?
विवाद का मूल प्रश्न यह नहीं है कि 100 किलो बीज कितने केंद्रों में बांटा जा सकता था, बल्कि यह है कि उपलब्ध संसाधनों का वितरण किस नीति और किन मानकों के आधार पर किया गया।
यदि बीज की मात्रा सभी पशुपालकों की मांग के मुकाबले कम थी, तो विभाग के सामने पारदर्शी आवंटन, क्षेत्रवार कोटा निर्धारित करने, पात्र लाभार्थियों की सूची बनाने अथवा उपलब्धता के अनुसार सभी केंद्रों को सीमित मात्रा देने जैसे विकल्पों पर विचार करने का सवाल उठता है।
दूसरी ओर, यदि विभाग के पास वितरण को केवल एक केंद्र तक सीमित रखने के लिए कोई प्रशासनिक या तकनीकी आधार था, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि पशुपालकों और जनप्रतिनिधियों की शंकाओं का समाधान हो सके।
बिना अभिलेखों की जांच के किसी अधिकारी की मंशा या अनियमितता के संबंध में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन सार्वजनिक धन और सरकारी सहायता से जुड़ी वितरण व्यवस्था पर सवाल उठने के बाद निष्पक्ष जांच की मांग को नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए।
जनप्रतिनिधियों ने निष्पक्ष जांच की आवश्यकता जताई
क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था की निष्पक्ष जांच जरूरी है। उनका सवाल है कि एक ओर सरकार किसानों और पशुपालकों के हित में योजनाएं संचालित करने तथा उनकी आय बढ़ाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर यदि सरकारी सहायता का वितरण सभी पात्र लोगों तक नहीं पहुंचता, तो योजनाओं का वास्तविक लाभ कैसे सुनिश्चित होगा?
जनप्रतिनिधियों की मांग है कि विभाग यह स्पष्ट करे कि बरसीम बीज की कुल कितनी मात्रा प्राप्त हुई, किन-किन केंद्रों को कितना बीज आवंटित किया गया, वितरण के लिए क्या मानक अपनाए गए और किन लाभार्थियों को बीज उपलब्ध कराया गया।
अब जांच के दायरे में होने चाहिए ये अहम सवाल
प्रकरण की निष्पक्षता से जांच के लिए निम्न बिंदुओं का सत्यापन किया जाना आवश्यक है:
आवंटन का आधार: शासन अथवा विभाग से 100 किलो बरसीम बीज किस आदेश और किन शर्तों के तहत प्राप्त हुआ था?
क्षेत्रवार वितरण: क्या द्योनाई, जखेड़ा, वज्यूला, धैना, पाटली, शीर और तिलसारी सहित अन्य केंद्रों के लिए कोई आवंटन निर्धारित किया गया था?
लाभार्थियों का विवरण: गरुड़ अस्पताल में कितने पशुपालकों को बीज दिया गया और वितरण की प्रक्रिया क्या थी?
पारदर्शिता: क्या वितरण रजिस्टर, स्टॉक रजिस्टर, प्राप्ति रसीदें और लाभार्थियों की सूची उपलब्ध हैं?
सरकारी दर की पुष्टि: बीज किस दर पर उपलब्ध कराया जाना था और क्या सभी पात्र पशुपालकों के लिए समान शर्तें लागू थीं?
विभागीय निर्णय: यदि बीज अन्य केंद्रों पर नहीं भेजा गया, तो इसके पीछे क्या लिखित प्रशासनिक कारण था?
जवाबदेही: यदि जांच में निर्धारित नियमों या आवंटन संबंधी निर्देशों का उल्लंघन पाया जाता है, तो जिम्मेदारी तय करने के लिए क्या कार्रवाई की जाएगी?
सरकार की किसान हितैषी योजनाओं की असली परीक्षा जमीनी स्तर पर
गरुड़ का यह मामला सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्व को रेखांकित करता है। पहाड़ी क्षेत्रों में पशुपालन केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि अनेक परिवारों की आजीविका का आधार है। ऐसे में चारा बीज जैसी सहायता का समय पर और न्यायसंगत वितरण ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
यदि सीमित मात्रा में उपलब्ध सरकारी सहायता का वितरण सभी पात्र क्षेत्रों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है, तो उसका लाभ अधिक व्यापक रूप से पहुंच सकता है। वहीं, यदि किसी क्षेत्र को प्राथमिकता देने के पीछे उचित और दर्ज कारण हैं, तो उन्हें स्पष्ट करना विभाग की जिम्मेदारी है।
अब देखना यह है कि पशुपालन विभाग इस मामले में वितरण से संबंधित अभिलेखों को सार्वजनिक कर पशुपालकों की शंकाओं का समाधान करता है या नहीं। साथ ही, जिलास्तर के अधिकारी इस प्रकरण की जांच कराकर यह स्पष्ट करते हैं या नहीं कि बरसीम बीज के वितरण में अपनाई गई प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुरूप थी।
पशुपालकों को जवाब चाहिए, जनप्रतिनिधियों को पारदर्शिता और आम जनता को यह भरोसा कि सरकारी योजनाओं का लाभ किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रहकर सभी पात्र लाभार्थियों तक पहुंचे।
