वन अधिकारों को लेकर ‘जन हस्तक्षेप ने केंद्र को दी चुनौती
देहरादून। जंगल में रहने वाले विशेषकर उत्तराखंड वासियों के परंपरागत अधिकारों पर खतरा मंडरा रहा है। यह कहना था जन ‘जन हस्तक्षेप का। वन अधिकार मुद्दे पर केंद्र की खामोशी पर सवाल उठाए। रोष व्यक्त किया। संगठनों ने कहा कि उत्तराखंड वासियों को वन अधिकार का पूर्ण लाभ मिले इसे लेकर दिसंबर में बड़ा आंदोलन चलाया जाएगा। सोमवार को वन अधिकारों को लेकर प्रेस क्लब में जन हस्तक्षेप के तत्वावधान में विभिन्न संगठनों ने पत्रकारों से बातचीत कर अपने विचार रखे। अपने संबोधन में चेतना आंदोलन के शंकर गोपाल ने कहा कि लोगों को उनके वन अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। जबकि वन अधिकार अधिनियम 2006 को ही पूर्ण रूप से लागू किया जाना चाहिए था। ऐसा नहीं होने पर 10 करोड़ से यादा जंगल में रहने वाले ख़ासतौर पर उत्तराखंड वासियों के परंपरागत हक खतरे में आ गए हैं। वहीं कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने कहा कि वन अधिकार मामलों में लापरवाही कतई नहीं होनी चाहिए। आम लोगों को विशेषकर उत्तराखंड वासियों को इसका हक मिलना चाहिए। सीपीआई के समर भंडारी ने कहा कि विगत 13 फरवरी को कोर्ट ने लाखों परिवारों को बेदखल करने का आदेश दिया था। उत्तराखंड में भी सैकड़ों परिवार बेदखली के खतरे में थे। बावजूद इसके सरकार ने न्यायपीठ से उक्त आदेश वापस लेने की मांग तक नहीं की। मात्र आदेश को कुछ समय के लिए स्थगित करने की बात कही। जबकि अगली सुनवाई अब 26 नवंबर को होगी। केंद्र सरकार ने सभी राय सरकारों को भारतीय वन कानून में संशोधन करने के लिए प्रस्ताव भेजा था। जिसमें मात्र वन विभाग का ही पक्ष लिया गया। वन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले लोगों के अधिकार पर कुछ नहीं कहा। पत्रकार वार्ता के दौरान ‘जन हस्तक्षेप ने कहा कि उत्तराखंडियों ने पहाड़ों और जंगलों का संरक्षण किया है। इसके एवज में सरकार को चाहिए कि वह लोगों वन अधिकारों की मान्यता दे। यदि ऐसा नहीं होता है तो दिसंबर में आंदोलन छेड़ा जाएगा। इस अवसर पर सीपीआईएम के बचीराम कंसवाल, सपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. एसएन सचान, वन अधिकार जन आंदोलन के प्रेम बहुखंडी आदि मौजूद रहे।
