जोशीमठ त्रासदी से सबक ले बने विकास -पर्यटन नीति
हिमालय की गोद में बसा आदि शंकराचार्य की तपस्थली और चार धामों में एक ज्योतिर्पीठ के रूप में विख्यात उत्तराखण्ड का ज्योतिर्मठ या जोशीमठ है, जिसका एक हिस्सा तेजी से धंस रहा है। धंसते शहर की त्रासदी यह है कि यहां रहने वाले करीब सात सौ परिवारों के घर दरारों से पट गए हैं और ढहने का खतरा देखते हुए उनमें रहने वालों को राहत शिविरों में भेज दिया गया है। धंसती इमारतें नजदीकी भवनों के लिए खतरा न बन जाएं, इसलिए उन्हें ढहाने का काम भी शुरू हो चुका है। जोशीमठ धंस रहा है, यह चर्चा बीते कई महीनों से थी। पर इधर जब एक के बाद एक करके छह-सात सौ घरों, होटलों, आंगनबाड़ी केन्द्र और तमाम इमारतों में फर्श, दीवारों में दरारें चौड़ी होने लगीं और भीतर से इनका दरकना टूटना शुरू हो गया तो लोगों के पास वहां से बाहर निकल कोई और आसरा खोजने के सिवा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा। यह एक भूकंप है जिसे पहले से बूझ लिया गया है। राहत सिर्फ इतनी है कि इस भूकंप से जान का कोई नुकसान नहीं होगा, बशर्ते अपनी जिंदगी भर की कमाई से बनाए घर से बेघर होने पर ठण्ड उसे न मार दे। सरकार-प्रशासन के स्तर पर राहत शिविर बनाने, जांच कमेटी गठित करने, प्रशासनिक अधिकारियों को बचाव कार्य के निर्देश जारी करने, मुख्यमंत्री के दौरे और प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से सक्रियता दिखाने के अलावा एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों की तैनाती जैसे प्रबंध कर दिए गए हैं। पर जोशीमठ के दरकने की घटना कोई पहली बार नहीं हो रही है। सिर्फ जोशीमठ ही क्यों, समूचा उत्तराखंड या कहें हिमालय इससे पहले भी टूटा फूटता धंसता- दरकता या यूं कहें कि घायल होता रहा है। वर्ष 2013 की 15-16 जून को घटित केदारनाथ त्रासदी को याद कर लें । फरवरी, 2021 में तपोवन इलाके के गांव रैणी में ग्लेशियर फटने की घटना को देख लें। सप्तऋषि और चंबा नाम के दो पहाड़ों के बीच स्थित ग्लेशियर फटा तो नीचे स्थित ऋषिगंगा में सुनामी आ गई। ऋषिगंगा का यह सैलाब आगे बढक़र धौलीगंगा में मिला और उस पर मौजूद एनटीपीसी के पावर प्रोजेक्ट को नुकसान पहुंचाने के अलावा वहां काम कर रहे मजदूरों, नजदीकी मुरिंडा नामक जंगल में घास काटने गई महिलाओं समेत 50 से ज्यादा लोगों को लील गया। ये आंकड़े तो सरकारी हैं, बताते हैं कि ऋषिगंगा में आई बाढ़ 150 से 200 मौतों का सबब बनी थी। एनटीपीसी की एक पनबिजली परियोजना जोशीमठ में भी है, जिसके लिए शहर के नीचे एक टनल बनाई जा रही है । कहने वाले कह रहे हैं कि यह टनल ही पहाड़ के दरकने की मूल वजह है। उधर, एक रोपवे प्रोजेक्ट भी है, जिसके खंबों के नीचे से ही बताते हैं कि पहाड़ की दरार शुरू हुई है और वहां से खिंचते-खिंचते शहर में उतर आई है। इसलिए बहस तेज है कि विकास के लिए पहाड़ पर बम की तरह बरसता इंसानी दखल ही जोशीमठ की रौनक बुझाने वाला साबित हो रहा है। हो सकता है कि जोशीमठ का मामला कुछ दिनों में शांत हो जाए या फिर सरकारी पराक्रम से मीडिया की सुर्खियों में रहने लायक न रह जाए, पर ऐसी दखलंदाजी पर देश की सर्वोच्च अदालत के आदेश पर बनी पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की 11 सदस्यीय विशेषज्ञ संस्था आज से नौ साल पहले जो बात कह चुकी है, उस पर हमें कान देने चाहिए। केदारनाथ त्रासदी (16-17 जून, 2013 की दरम्यानी रात ) की जांच के लिए बनाई गई इस विशेषज्ञ संस्थान संस्था ने 2014 में अपनी रिपोर्ट दी और उसमें कहा था कि उत्तराखंड में मौजूद और जारी निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाएं पहाड़ में हो रहे विनाश के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। उत्तराखंड में विकास का ताजा घटनाक्रम वहां बने ऑल वेदर हाईवे (रोड) प्रोजेक्ट से संबंधित है, पर उसके आगे-पीछे भी तमाम ऐसी गतिविधियां इस पर्वतीय राज्य में चल रही हैं जिन्होंने प्रकृति और वहां रह रहे लोगों को त्राहिमाम कहने को मजबूर कर दिया है। हमारे देश में, खासकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश आदि पर्वतीय राज्यों में आज हर पर्यटन स्थल दुकानों से भरा हुआ है। जरा सोचिए कि जिस पहाड़ जंगल में ऊंची आवाज में बोलना इसलिए वर्जित माना जाता है ताकि वहां के वन्यजीवों और शांति में खलल न पड़े, वहां केदरानाथ के लिए गर्जना करते हेलीकॉप्टरों की सतत आवाजाही (कपाट खुलने बंद होने तक) जारी रहती है। तीर्थ क्षेत्र में आक्रामक पर्यटन के वास्ते बन रही परियोजनाएं कहीं ज्यादा नुकसान कर रही हैं। हालांकि जोशीमठ के धंसने-दरकने के कुछ कारण और हैं । यहां की जमीन चूंकि खोखली है, इसलिए वह खिसकती और धंसती रहती है। इससे जमीन के ऊपर बने मकानों में जब-तब दरारें उभरने लगती हैं। साल 2006 में आई एक वैज्ञानिक रिपोर्ट में कहा गया था कि जोशीमठ प्रतिवर्ष एक सेंटीमीटर धंस रहा है ।
