केदारनाथ यात्रा: आस्था के पर्व पर सुव्यवस्था की अनिवार्यता
अर्जुन राणा
हिमालय की ऊँचाइयों में बसा केदारनाथ धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय आस्था, विश्वास और श्रद्धा का अद्वितीय प्रतीक है। हर वर्ष जब बर्फ से ढकी चोटियों के बीच मंदिर के कपाट खुलते हैं, तो हजारों नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालु हृदय में अपार श्रद्धा और आंखों में दिव्यता का सपना लिए इस कठिन यात्रा पर निकल पड़ते हैं। वर्ष 2024 में ही करीब 16 लाख लोग पैदल मार्ग से केदारनाथ पहुंचे, और यदि इसमें घोड़े-खच्चरों, पालकियों और सेवा कार्य में जुटे हजारों स्थानीय लोगों की संख्या को भी जोड़ दें, तो यह आंकड़ा 20 लाख के आसपास पहुंचता है।
अब ज़रा कल्पना कीजिए — इतनी बड़ी भीड़, एक ही तंग, पहाड़ी और संवेदनशील रास्ते पर चल रही हो। संकरे मोड़, खड़ी चढ़ाइयां, बदलते मौसम और सीमित व्यवस्थाएं इस यात्रा को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना देती हैं। ऐसा नहीं है कि यह मार्ग श्रद्धालुओं के लिए नया है, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। लोगों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हो रही है, और उनके साथ बढ़ रही है दुर्घटनाओं की आशंका।
यह जरूरी हो गया है कि अब केवल परंपरा और आस्था के सहारे नहीं, बल्कि दूरदर्शी नियोजन और ठोस बुनियादी ढांचे के साथ इस यात्रा को संभाला जाए। सबसे पहला कदम — वैकल्पिक पैदल मार्गों का निर्माण और सुदृढ़ीकरण। केवल एक मुख्य मार्ग पर निर्भर रहना, आपदा के समय या अत्यधिक भीड़ में खतरे को न्यौता देना है। यदि दो या अधिक सुगम, सुरक्षित और सुव्यवस्थित मार्ग होंगे, तो न केवल भीड़ का दबाव विभाजित होगा, बल्कि राहत और बचाव कार्यों में भी गती आएगी।
लेकिन केवल रास्ता बना देना पर्याप्त नहीं। हर मार्ग पर सुविधाएं — जैसे छायादार विश्राम स्थल, स्वच्छ पेयजल, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, दिशा सूचक बोर्ड और सबसे महत्वपूर्ण — मजबूत संचार व्यवस्था भी होनी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में अक्सर मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट सेवाएं बाधित हो जाती हैं। इस कारण यात्रियों के परिजन दूर बैठकर चिंता में डूब जाते हैं, और किसी आपातकालीन स्थिति में जरूरी सूचनाएं समय पर नहीं पहुंच पातीं।
इतना ही नहीं, संचार की कमी से अफवाहें तेज़ी से फैलती हैं — ‘भूस्खलन हो गया’, ‘कोई लापता हो गया’, ‘सड़क बंद हो गई’ जैसी असत्य बातें लोगों के मन में भय और भ्रम पैदा करती हैं। इन्हें रोकने का एकमात्र उपाय है — हर मार्ग और हर पड़ाव पर भरोसेमंद, निरंतर संचार की सुविधा।
हमें यह समझना होगा कि केदारनाथ की यात्रा केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि लाखों परिवारों के लिए एक भावनात्मक अनुभव है। उनकी सुरक्षा, सुविधा और शांति केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना का भी दायित्व है।
यदि हम सच में इस यात्रा को दिव्यता और गरिमा से सम्पन्न करना चाहते हैं, तो आस्था के इस पर्व पर सुव्यवस्था को भी उतनी ही प्राथमिकता देनी होगी। हिमालय का हृदय तभी प्रसन्न होगा, जब उसकी गोद में आने वाले हर यात्री को न केवल अध्यात्म, बल्कि सुरक्षा, सुविधा और सम्मान का अनुभव हो।
