2027 की डिजिटल जनगणना: भारत के भविष्य की रूपरेखा
भारत में 2027 में होने जा रही डिजिटल जनगणना न केवल तकनीकी दृष्टि से एक ऐतिहासिक कदम है, बल्कि यह देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दिशा तय करने वाली सबसे बड़ी प्रशासनिक कवायद भी होगी। 16 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद, केंद्र सरकार ने इस जनगणना को डिजिटल स्वरूप में कराने की अधिसूचना जारी की है, जो एक बहुआयामी और बहुद्देशीय प्रयास सिद्ध होगा।
2027 की जनगणना से पहले अंतिम जनगणना वर्ष 2011 में हुई थी। तब जनगणना की प्रक्रिया कागज़ और कलम से की गई थी, जिसमें कई त्रुटियों की संभावनाएँ थीं। इस बार यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से सशक्त और अधिक सटीक होगी। लगभग 34 लाख कर्मचारी, जिनमें से 1.3 लाख डिजिटल विशेषज्ञ होंगे, देश के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में जाकर आंकड़े एकत्र करेंगे। यह अभियान विश्व का अब तक का सबसे बड़ा प्रशासनिक कार्य होगा।
इस बार जनगणना केवल जनसंख्या की गिनती तक सीमित नहीं रहेगी। इसमें घर, ज़मीन, लिंग पहचान (पुरुष, महिला, अभयलिंगी), जातीय समूह, अनुसूचित जाति-जनजाति, जल स्रोत, शैक्षिक संस्थान, धार्मिक स्थल, बुनियादी ढांचे और जनप्रतिनिधियों की भी जानकारी ली जाएगी। इससे सरकार को नीतिगत निर्णय लेने में अत्यधिक सहायता मिलेगी।
सबसे अहम बात यह है कि इस जनगणना में आधार आधारित सत्यापन प्रणाली लागू होगी। दोहराव और फर्जीवाड़ा रोकने के लिए व्यक्ति की जानकारी तब तक स्वीकार नहीं होगी, जब तक वह आधार डेटा से मेल नहीं खाती। इससे देश की वास्तविक जनसंख्या का सटीक आंकलन संभव हो पाएगा। लंदन स्थित स्टडी फॉर ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की वर्तमान जनसंख्या अनुमान से कम हो सकती है, क्योंकि 2011 की जनगणना अनुमानित और कथन आधारित थी।
इसके अलावा, 2027 की जनगणना एक स्थायी मतदाता सूची का भी निर्माण करेगी, जिससे 18 वर्ष की आयु पूर्ण करते ही नागरिक स्वचालित रूप से मतदाता सूची में जुड़ जाएगा। इससे लोकतांत्रिक प्रणाली और अधिक सशक्त होगी।
यह जनगणना समाज के शोषित, वंचित और पिछड़े वर्गों के लिए भी निर्णायक होगी। कौन सी जातियाँ किन क्षेत्रों में निवास करती हैं, उनका सामाजिक-आर्थिक स्तर क्या है, किन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और आरक्षण में प्राथमिकता की आवश्यकता है—ये सभी आंकड़े नीति निर्धारण का आधार बनेंगे। इससे समान अवसर और समावेशी विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।
जनसंख्या वृद्धि को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आएगी। विशेषज्ञों के अनुसार, 2050 तक भारत की जनसंख्या स्थिर हो सकती है, क्योंकि वर्तमान प्रजनन दर 2.1 पर है और इसके 1.9 तक गिरने की संभावना है। इस स्थिति में मृत्यु दर का बढ़ना और जन्म दर का घटना एक नई जनसांख्यिकीय तस्वीर प्रस्तुत करेगा, जिससे सामाजिक संरचना में बदलाव संभावित है।
भारत जैसे विशाल और विविधता भरे देश में जनगणना एक दिशा सूचक की भूमिका निभाती है। यह केवल आंकड़े नहीं देती, बल्कि यह बताती है कि देश कहां खड़ा है और उसे कहां जाना है। 2027 की डिजिटल जनगणना इस मायने में एक क्रांतिकारी परिवर्तन है, जिससे न केवल शासन की पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि योजनाओं की प्रभावशीलता और सार्वजनिक जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार होगा।
आशा की जानी चाहिए कि यह जनगणना केवल आंकड़े नहीं देगी, बल्कि भारत के भविष्य का खाका तैयार करने में एक मजबूत नींव सिद्ध होगी।
