उत्तराखंड : आपदा पर बड़े सवाल? कब लगेंगे संवेदनशील स्थानों पर अलर्ट सिस्टम ?
देहरादून । आपदा के लिहाज से संवेदनशील उत्तराखंड में मौसम पूर्व चेतावनी को लेकर स्थानीय स्तर पर ऐसा कोई अलग से सिस्टम नहीं है। अधिकांश स्थानों पर सिर्फ बारिश को मापने के ही यंत्र लगे हैं। यहां टिहरी के सुरकंडा, पौड़ी के लैंसडौन और नैनीताल के मुक्तेश्वर में डॉप्लर रडार लगे हैं। नैनीताल के एरीज में स्ट्रैटोस्फीयर-ट्रोपोस्फीयर रडार है। बावजूद इसके मौसम पूर्व चेतावनी को लेकर पूरी निर्भरता भारतीय मौसम विज्ञान विभाग(आईएमडी) पर है। यहां से चेतावनी जारी होने पर एसएमएस से अलर्ट जरूर किया जाता है। बाकी जिला मुख्यालयों के अलावा तहसीलों और कुछ थानों में ही सायरन सिस्टम लगे हैं। धराली के आपदा के बाद मौसम पूर्व चेतावनी सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत महसूस की जा रही है। गढ़वाल में प्रमुख नदियों पर ही हैं चेतावनी सिस्टम उत्तरकाशी जिले की बिजली परियोजनाओं, जिला और तहसील मुख्यालयों में चेतावनी सिस्टम लगे हैं, लेकिन धराली, हर्षिल समेत दूरस्थ इलाकों में ऐसे कोई सायरन सिस्टम अभी नहीं है, जिनका उपयोग आपदा से ठीक पहले किया जा सके। टिहरी जिले में भी टीएचडीसी ने भागीरथी और गंगा नदी के तटों पर चेतावनी सिस्टम लगाए हैं, लेकिन आपदा के लिहाज से संवेदनशील प्रतापनगर, फकोट, गजा, पावकी देवी समेत अन्य स्थानों पर मौसम निगरानी सिस्टम नहीं है। पौड़ी के जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी के मुताबिक बाढ़ आदि आपदा की स्थिति में कालागढ़, श्रीनगर, देवप्रयाग के साथ ही लक्ष्मणझूला में सायरन सिस्टम लगे हैं। कुमाऊं में सायरन सिस्टम के विस्तार की जरूरत नैनीताल के जिला आपदा प्रभारी अधिकारी कमल सिंह मेहरा के अनुसार नैनीताल मुख्यालय और सभी तहसील मुख्यालयों में सायरन सिस्टम लगे हैं। अल्मोड़ा की जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी विनीत पाल ने बताया कि तहसीलों में सायरन सिस्टम लगाने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है। चंपावत में अभी विकासखंड स्तर पर सायरन सिस्टम लगाए जाने की जरूरत है। उधमसिंहनगर में प्रमुख बैराजों में सायरन सिस्टम तो लगे हैं, लेकिन यूजर फ्रेंडली मॉनिटरिंग सिस्टम की दरकार है। अतिसंवेदनशील जिलों में ग्रामीण इलाके अछूते अतिसंवेदनशील बागेश्वर जिले में भी सिर्फ छह सायरन सिस्टम ही लगे हैं, जो थाने और तहसीलों में है। यहां ग्रामीण इलाकों में ऐसी कोई व्यवस्था अभी नहीं है। आपदा के लिहाज से संवेदनशील चमोली जिले में बिजली परियोजनाओं, जिला और तहसील मुख्यालयों में सायरन सिस्टम लगे हैं। लेकिन यहां विकासखंड स्तर पर ऐसे कोई सिस्टम नहीं है। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी एनके जोशी ने बताया बिजली परियोजनाओं के सायरन सिस्टम का उपयोग आपदा चेतावनी के रूप में किया जा रहा है। यही स्थिति रुद्रप्रयाग में भी है। यहां बारिश का डाटा जुटाने और नदियों के जल स्तर की निगरानी के साथ ही बिजली घरों में सायरन सिस्टम लगे हैं, लेकिन स्थानीय स्तर आपदा पूर्व चेतावनी के लिए अलग से कोई सिस्टम नहीं है। पिथौरागढ़ जैसे जिले में 12 तहसीलों में सिर्फ बारिश मापने के यंत्र लगे हैं। अतिवृष्टि, बाढ़, भूस्खलन की स्थिति में चेतावनी जिला और निकाय मुख्यालयों को छोड़कर बाकी कहीं सायरन सिस्टम नहीं लग पाए हैं।
