January 30, 2026

मोदी एक बार कह दें कि ट्रंप ने जंग नहीं रूकवाई


संसद के मानसून सत्र का इंतजार सबको था। इंतजार इसलिए था क्योंकि सरकार ने पहलगाम कांड और आपेरशन सिंदूर के बाद विशेष सत्र बुलाने की विपक्ष की अपील पर ध्यान नहीं दिया था। संसद में खड़े होकर विपक्ष को जवाब देने और देश के नागरिकों को इसकी सचाई बताने की बजाय सरकार दुनिया भर के देशों में डेलिगेशन भेज कर उनके सामने अपना पक्ष रख रही थी। तभी जब मानसून सत्र की शुरुआत हुई और यह तय हुआ कि दूसरे हफ्ते के पहले दिन यानी सोमवार, 28 जुलाई को पहलगाम कांड व आपरेशन सिंदूर पर चर्चा शुरू होगी तो उम्मीद थी कि इनसे जुड़े समूचे घटनाक्रम की सचाई सामने आएगी। सरकार हर पहलू के बारे में जानकारी देगी। विपक्ष जो सवाल पहले से उठा रहा है और जो सदन में सवाल उठाए जाएंगे, उनका वस्तुनिष्ठ तरीके से जवाब दिया जाएगा। लेकिन अफसोस की बात है कि दो दिन की लंबी चर्चा और प्रधानमंत्री के लंबे भाषण के बाद भी बहस अधूरी ही रह गई। इस बहस के बाद यह धारणा भी मजबूत हुई कि भारत में संसदीय बहसों का स्तर लगातार गिरता जा रहा है और सारी संसदीय बहस सिर्फ राजनीति साधने और चुनावी लाभ के लिए होती हैं। किसी भी सभ्य लोकतंत्र में संसदीय बहसें ऐसी नहीं होती हैं। भारत में भी कोई संविधान सभा की बहस के दस्तावेज पढ़े तो उसे भी आज जो हो रहा है उस पर शर्म ही आएगी।
बहरहाल, पहलगाम कांड और आपरेशन सिंदूर से जुड़े कौन से सवाल थे, जिनके वस्तुनिष्ठ जवाब की जरुरत थी, उस पर आने से पहले एक रूपक के जरिए इस बहस को समझते हैं। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के बिजली मंत्री का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक व्यक्ति उनसे बिजली नहीं आने की शिकायत कर रहा था। वह व्यक्ति कह रहा था कि सिर्फ तीन घंटे बिजली आती है और अधिकारी कोई सुनवाई नहीं कर रहे हैं। थोड़ी देर तक यह बात सुनने के बाद माननीय बिजली मंत्री ने अपने गले में पड़ी ढेर सारी मालाएं निकालीं और जोर से नारा लगाया, जय श्रीराम! बात वही खत्म हो गई। लोकसभा में पहलगाम कांड और आपरेशन सिंदूर पर सत्तापक्ष यानी भाजपा और उसके सहयोगी दलों के सभी नेताओं का भाषण इसी श्रेणी का था। सवालों का जवाब देने की बजाय सत्तापक्ष के लगभग सारे वक्ता सेना के शौर्य का गुणगान कर रहे थे, अपनी पीठ थपथपा रहे थे, अपनी छाती ठोक रहे थे और 77 साल पहले वाली सरकार की कमियां गिना रहे थे।

सोचें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने करीब एक सौ मिनट के भाषण में 14 बार देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का नाम लिया! क्या पहलगाम कांड और आपरेशन सिंदूर पर होने वाली चर्चा में देश के लोग यही सुनना चाहते थे? नेहरू की गलतियां थीं या इंदिरा गांधी ने गलती की या उसके बाद की कांग्रेस सरकारों ने गलतियां कीं तभी तो देश की जनता ने भाजपा और नरेंद्र मोदी को मौका दिया है! अब तो देश के लोग इस सरकार से उम्मीद कर रहे हैं। नेहरू का या इंदिरा गांधी का नाम लेकर किसी भी तात्कालिक मुद्दे पर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता है। नेहरू की गलतियां अपनी जगह हैं, जिनके बारे में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी एक सौ साल से बोल रहे हैं। लेकिन लोग तो यह जानना चाहते थे कि पर्यटकों की उतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद पहलगाम घाटी में एक भी सुरक्षाकर्मी क्यों नहीं तैनात था? लोग यह जानना चाहते थे कि आतंकवादी 20 मिनट तक तांडव करते रहे और उतनी देर में एक भी सुरक्षाकर्मी नहीं पहुंचा और आतंकवादियों के जवाब देने के लिए एक भी गोली नहीं चली तो ऐसा क्यों हुआ? यह तो संभव नहीं है कि नेहरू या इंदिरा गांधी ने ऐसा करने से रोक दिया था? सरकार को इस पर जवाब देना चाहिए था और अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए थी। लेकिन प्रधानमंत्री के इतने लंबे भाषण में एक बार भी पहलगाम में मारे गए 26 बेकसूर नागरिकों का जिक्र नहीं आया।
देश के लोग जानना चाहते थे कि आपरेशन सिंदूर हुआ, जिसमें भारतीय सेना ने अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन किया तो फिर 88 घंटे के भीतर सीजफायर क्यों हो गया? जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा कि पाकिस्तान के सैन्य अभियानों के महानिदेशक यानी डीजीएमओ ने भारत के डीजीएमओ से गुहार लगाई कि पाकिस्तान अब और हमला नहीं झेल सकता है तो युद्धविराम हो गया। सवाल है कि पाकिस्तान मजबूर था कि वह हमारा हमला नहीं झेल पा रहा था लेकिन हमारी क्या मजबूरी थी? हमने क्यों सीजफायर स्वीकार कर लिया? अगर स्वीकार किया तो पाकिस्तान के सामने क्या शर्तें रखीं और क्या उसने हमारी कोई शर्त स्वीकार की? दुनिया के तमाम सामरिक और रक्षा विशेषज्ञों ने कहा कि भारत को दो तीन दिन और हमले जारी रखने चाहिए थे ताकि पाकिस्तान का सैन्य ढांचा स्थायी रूप से खत्म हो और उसके सैन्य नेतृत्व की कमजोरी पाकिस्तान की जनता के सामने जाहिर हो। लेकिन इसका उलटा हुआ। बिना शर्त युद्धविराम की वजह से पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व को छाती ठोक कर जीत का दावा करने का मौका मिला और आज पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व पहले से ज्यादा मजबूती और ताकत के साथ भारत विरोधी गतिविधियों में लगा है। पाकिस्तान और पाकिस्तान के बाहर भी उसकी प्रतिष्ठा कम होने की बजाय बढ़ गई है। ऐसा क्यों हुआ कि भारत जीतता हुआ पक्ष था लेकिन उसने बिना शर्त सीजफायर कर लिया, इस सवाल का जवाब नहीं दिया गया।

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