उत्तराखंड रजत जयंती पर चुनौतियों के अंबार
अर्जुन राणा
आज जब उत्तराखंड राज्य अपनी रजत-जयंती अर्थात् २५ वर्षों की पूर्णता पर इसे धूम-धाम से मना रहा है तो यह इस पर्व पर गौर करने का श्रेष्ठ अवसर है कि इस दौरान राज्य किन-किन चुनौतियों का अभी भी सामना कर रहा है।
९ नवम्बर २००० को उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया। उस समय राज्य की आर्थिक-सामाजिक संरचना चुनौतीपूर्ण थी: पर्वतीय भूगोल, सीमित औद्योगिकीकरण, पलायन एवं रोजगार की कमी जैसी चुनौतियाँ मौजूद थीं। आज २५ वर्ष बाद, इस “देवभूमि” ने अपने लिए एक पहचान बनाने के साथ-साथ अनेक विकास की उपलब्धियाँ भी प्राप्त की हैं।
परंतु यह भी सत्य है कि विकास का लाभ हर क्षेत्र एवं वर्ग तक समान रूप से नहीं पहुंचा और अब भी कई मूलभूत समस्याएँ बनी हुई हैं। जो आज भी जनता की आँखों में सवाल छोड़ रहे हैं।
पहाड़ी इलाकों से बड़ी संख्या में लोग अन्य राज्यों या मैदानी इलाकों की ओर पलायन कर रहे हैं रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं की कमी मुख्य कारण हैं।
उदाहरण के लिए, 2022 के एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य में लगभग 1,700 गाँव “आंशिक या पूर्णतः परित्यक्त” दर्ज हैं।
सामाजिक वैज्ञानिकों का निष्कर्ष यह है कि पुरुषों की संख्या राज्य में घट रही है, विशेषकर ग्रामीण पहाड़ी गाँव इलाकों में।
ऐसे पलायन ने जनसंख्या-संरचना, श्रम-उपलब्धता और सामाजिक-संघटनाओं को प्रभावित किया है।
रोजगार के अवसर सीमित रहे हैं, विशेषकर ग्रामीण-पहाड़ी इलाकों में। आज पहाड़ी क्षेत्र के गावो में बेरोजगारी अपने चरम पर पहुच चुकी हैं। गाँव के युवाओं के लिए आज की तारीख में उनके यहाँ किसी भी तरह का रोजगार नही हैं। अब उनके गुजर बसर व जीवन यापन र भी गम्भीर प्रश चिन्ह खड़ा होता नजर आ रहा हैं।
आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश युवा- पुरुष अभी भी अस्थिर व असंपूर्ण रोजगार की ओर धकेले जा रहे हैं, जिनमें संसाधनों की कमी तथा अवसरों की अनिश्चितता बनी हुई है।
उत्तराखंड का अधिकांश भाग भूकंपीय एवं जलप्रवाहित क्षेत्र है। विकास-प्रक्रियाओं ने आपदा-दायित्वें भी बढ़ाई हैं।
विकास-परियोजनाओं (पथ, डैम, रोड, टनल) ने पर्यावरणीय दबाव बढ़ाया है, जिससे पहाड़ी इलाकों में जोखिम बढ़ गया है। देखने मे आया हैं कि है उत्तराखंड में पर्यटन व विकास-भूमिकाओं के कारण पर्यावरणीय संकट गहरा रहा है।
आज भी राज्य के कई गांव सड़क मार्ग से नही जुड़ पाए है। जब इन गांवों में किसी को तकलीफ / बीमारी होती हैं तो उन्हें पुराने जमाने की तरह डोली में बैठकर अनेक किलोमीटर पैदल मार्च करना पड़ रहा हैं।
शहरी क्षेत्रों से बहुत सारे गम्भीर मरीज हल्द्वानी जाने तक रास्ते मे ही दम तोड़ देते हैं।
शिक्षा-उपलब्धि में हेतू आज भी गाँव से युवा शहर की ओर जाने को मजबूतर ह जिला-स्तर तथा ग्रामीण-शहरी अंतर अभी भी व्यापक है।
स्वास्थ्य-सेवाओं की पहुँच, विशेष रूप से ऊँचे-पहाड़ी इलाकों में, अभी भी चुनौती है।
बागेश्वर जिले में अभीतक एक अदद एमआर आई तक कि सुविधा उपलब्ध न हो सकी हैं। विशेषज्ञ चिकित्सक हमेशा अपर्याप्त ही रहते हैं।
कृषि व बागवानी में युवा निवेश कम हुआ है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था स्थिर नहीं बन सकी।
यदि आने वाले वर्षों में उत्तराखंड को “सच्चा हिल-मॉडल” बनना है, तो उसे इन चुनौतियों को प्राथमिकता देना होगा। राज्य को चाहिए कि वह अपनी भू-सापेक्षता को अवसर में बदलते हुए, स्थानीय लोगों की भागीदारी व स्वायत्तता को बढ़ावा दे। योजनाओं को सिर्फ “घोषणा” में न रोकते हुए, उनकी क्रियान्विति, निगरानी व माप-दण्ड तय कर निरंतर सुधार करे।
२५ वर्षों का यह सफर गर्व करने योग्य है — लेकिन अगर अगले २५ वर्षों में उत्तराखंड “मनाने योग्य विकास” को वास्तविकता में बदलना चाहता है, तो उसे जनता के दुःख-स्मरण को साथ लेकर चलना होगा। विकास तभी सच्चा होगा जब उसके कंधे पर उत्तराखंड के विपरीत भू-भागों का, पहाड़ी-अंचलों का, पलायन के शिकार गाँवों का, बेरोजगार-युवाओं का न्याय हो सके।
