विश्व मानवाधिकार दिवस: हमारी दैनिक आवश्यकताएं और एक साझा प्रतिबद्धता
अर्जुन राणा
आज 10 दिसंबर 2025 को विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में हम एक बार फिर उस मूलभूत सत्य की ओर लौटते हैं जिसने सात दशक पहले दुनिया को एक नई दिशा दी थी। मानवाधिकार कोई दूर का आदर्श नहीं, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का वह ऑक्सीजन हैं जिसके बिना हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं। इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र ने थीम चुनी है – “मानवाधिकार, हमारी दैनिक आवश्यकताएं” – और यह शब्द जितने साधारण लगते हैं, उतने ही गहरे हैं। ये अधिकार न केवल सकारात्मक हैं, आवश्यक हैं, बल्कि पूरी तरह प्राप्त करने योग्य भी हैं, बशर्ते हम उन्हें गंभीरता से लें।
सत्तर वर्ष पहले, जब द्वितीय विश्व युद्ध की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी, पेरिस में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा को अपनाया था। उस एक दस्तावेज़ ने कहा था कि हर इंसान जन्म से ही स्वतंत्र और गरिमामय है। जाति, रंग, लिंग, धर्म, भाषा या सीमा कुछ भी उसे इस गरिमा से वंचित नहीं कर सकती। आज वह घोषणा दुनिया के सबसे ज़्यादा अनुवादित दस्तावेज़ के रूप में 577 भाषाओं में मौजूद है, और भारत का संविधान भी उसी रोशनी में लिखा गया। गांधी से मंडेला तक, डॉ. आंबेडकर से मार्टिन लूथर किंग तक, इन अधिकारों के लिए खून बहा है, जेलें काटी हैं, ज़िंदगियाँ कुर्बान की हैं।
फिर भी आज जब हम यह दिवस मना रहे हैं, दुनिया कई मोर्चों पर पीछे खिसकती दिखाई देती है। यूक्रेन की सड़कों पर बमबारी, गाज़ा के मलबे में दबे बच्चे, म्यांमार के रोहिंग्या, भारत के भीतर ध्रुवीकरण की बढ़ती खाइयाँ, जलवायु विस्थापित होते द्वीपवासी, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के ज़रिए बढ़ता डिजिटल निगरानी तंत्र – ये सब उस 1948 के वादे पर सवाल खड़े करते हैं। आठ करोड़ से ज़्यादा लोग आज भी जबरन विस्थापित हैं। महिलाओं, अल्पसंख्यकों, एलजीबीटीक्यू+ समुदाय पर हिंसा कम होने का नाम नहीं ले रही। महामारी ने दिखा दिया कि स्वास्थ्य का अधिकार भी कितना कमज़ोर हो सकता है जब वैक्सीन तक असमानता की शिकार हो जाए।
भारत में हम गर्व करते हैं कि हमारे पास मौलिक अधिकारों का मज़बूत ढांचा है, फिर भी किसानों की आत्महत्या, मॉब लिंचिंग की घटनाएँ, सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर बहसें, और धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल हमें आईना दिखाते हैं। हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, लेकिन डेटा गोपनीयता और एल्गोरिदमिक भेदभाव जैसी नई चुनौतियों से अभी पूरी तरह जूझ भी नहीं पाए हैं।
इसीलिए यह दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन और नई प्रतिज्ञा का दिन है। संयुक्त राष्ट्र इस बार कह रहा है कि मानवाधिकार कोई लग्ज़री नहीं, हमारी रोज़ की ज़रूरत हैं – जैसे हवा, पानी, रोटी। और इन्हें हासिल करना असंभव नहीं। एक छोटा-सा कदम – जब हम किसी अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं, जब हम किसी अनसुनी कहानी को सुनते हैं, जब हम अपने बच्चों को समानता का पाठ पढ़ाते हैं – यही कदम मिलकर पहाड़ हिला सकते हैं।
इस साल जेनेवा में होने वाला राइट्सएक्स समिट कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मानवाधिकारों की रक्षा का हथियार बनाने की बात कर रहा है, बुडापेस्ट में युवाओं को मानवाधिकार शिक्षा दी जा रही है। ये संकेत हैं कि नई पीढ़ी पुरानी गलतियों को दोहराना नहीं चाहती।
तो आज जब हम दीप जलाएं, सेमिनार करें, ट्वीट करें, तो एक पल को रुककर पूछें – क्या मैंने आज किसी का हक छीना तो नहीं? क्या मैंने किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाई तो नहीं? क्योंकि एक व्यक्ति का अधिकार जब छिनता है, तो पूरी मानवता का एक टुकड़ा मरता है।
विश्व मानवाधिकार दिवस हमें याद दिलाता है कि ये अधिकार कोई सरकार का उपकार नहीं, हमारा जन्मसिद्ध हक हैं। इन्हें बचाना हमारी साझा ज़िम्मेदारी है। आज से फिर शुरू करें – एक छोटा कदम, एक नई शुरुआत। क्योंकि जब तक एक भी इंसान बंधन में है, तब तक कोई भी पूरी तरह आज़ाद नहीं।
