January 17, 2026

राजनीती का बदलता दौर

पहले के समय की राजनीति समाज के नैतिक ढांचे पर गहराई से आधारित होती थी। उस दौर में नेता अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर जनता के कल्याण के लिए काम करते थे और सामुदायिक सेवा को अपना मुख्य उद्देश्य मानते थे। उनका राजनीतिक कर्तव्य सिर्फ सत्ता प्राप्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि वह एक नैतिक जिम्मेदारी भी थी। जनता के साथ सीधे संवाद, पारस्परिक विश्वास, और सामाजिक मूल्यों की रक्षा प्रमुख भूमिका निभाते थे। इसका परिणाम था कि राजनीतिक फैसले जनहित और नैतिकता के आधार पर लिए जाते थे, जिससे समाज में स्थिरता और विश्वास बना रहता था।

इसके विपरीत, आज की राजनीति अधिक प्रतिस्पर्धात्मक और रणनीतिक हो चुकी है। राजनीतिक दल और नेता सत्ता की कुर्सी प्राप्त करने और बनाए रखने के लिए विभिन्न कूटनीतिक तरीकों, धन और प्रभाव के उपयोग में लग गए हैं। चुनाव प्रचार में भारी मात्रा में वित्तीय संसाधन लगते हैं, और विज्ञापन, सोशल मीडिया अभियानों, तथा जनमत सर्वेक्षणों के सहारे वोटरों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाला जाता है। इस प्रतिस्पर्धा में कई बार नैतिकता का तिरस्कार हो जाता है और भ्रष्टाचार, गठबंधनबाजी, दल-बदल जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं।

राजनीति का स्वरूप एक खेल बन गया है, जिसमें जनहित कई बार गौण हो जाता है।हालांकि, लोकतंत्र की मजबूती और स्वस्थ विकास के लिए पुराने समय के ईमानदारी, पारदर्शिता और जनहित केंद्रित सिद्धांत आज भी अत्यन्त आवश्यक हैं। राजनीति को केवल सत्ता का साधन मानने की बजाय सेवा का माध्यम बनाना होगा। यदि वर्तमान राजनीतिक समूह पुराने समय के नैतिक मूल्य अपनाएं, तो यह न केवल जनता का विश्वास बढ़ाएगा बल्कि सामाजिक न्याय और विकास की दिशा में भी बड़े कदम होंगे।

राजनीति में जनहित की प्राथमिकता ही लोकतंत्र को सशक्त और टिकाऊ बनाएगी।इसलिए विकास और आधुनिकता के साथ राजनीति का स्वरूप बदलना स्वाभाविक है, लेकिन इस बदलाव में नैतिकता और सेवा भावना को बनाए रखना आवश्यक है। पुराने समय की राजनीति के उन सिद्धांतों को आज के नेतृत्व और जनता दोनों के स्तर पर अपनाकर लोकतंत्र में स्थायित्व लाया जा सकता है। यही समृद्ध और सफल लोकतंत्र की पहचान होगी, जो न केवल सत्ता की होड़ में फंसा हो बल्कि समाज के हर वर्ग की अपेक्षाओं और हितों का संवाहक भी हो।

पत्रकार जगदीश पाण्डेय (आजतक़).