June 13, 2026

बागेश्वर जिले के अस्पतालों में ‘मौत का साया’: कांग्रेस की चेतावनी- 20 दिसंबर तक सुधार नहीं तो धरना-प्रदर्शन!

अर्जुन राणा


बागेश्वर । उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। कांग्रेस पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष भगवत सिंह डसीला ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) को एक तीखा पत्र लिखकर जिले के अस्पतालों की ‘दयनीय’ स्थिति पर सवाल उठाए हैं। पत्र में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, दवाओं की किल्लत, एम्बुलेंस की खस्ताहाली और मरीजों की मौतों का जिक्र करते हुए चेतावनी दी गई है कि अगर 20 दिसंबर तक समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो कांग्रेस जिला अस्पताल परिसर में बड़े पैमाने पर धरना-प्रदर्शन करेगी।
पत्र में डसीला ने आरोप लगाया है कि जिले के अस्पताल ‘संवेदनहीन प्रबंधन’ के शिकार हैं, जहां मरीजों की मौतें आम हो गई हैं। उन्होंने कहा, “विगत तीन-चार महीनों में कई मरीजों की अल्पायु में मौत हुई है, और परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर पैसे लेने तक के आरोप लगाए हैं। सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में ये खबरें छाई रहती हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही।”
मुख्य समस्याएं: एक नजर में
पत्र में 14 बिंदुओं में जिले के स्वास्थ्य तंत्र की कमियों को उजागर किया गया है। इनमें से कुछ प्रमुख हैं:
डॉक्टरों की कमी: जिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी है। पैथोलॉजिस्ट ओपीडी संभाल रहे हैं, जबकि ब्लड बैंक होने के बावजूद गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को खून नहीं मिल पाता।
स्टाफ की कमी: सीएचसी और पीएचसी सेंटरों में डॉक्टरों और अन्य स्टाफ की कमी है। कुछ डॉक्टरों को प्रभारी मंत्री ने अपनी विधानसभा में ट्रांसफर कर लिया, जबकि अन्य को सीएमओ कार्यालय में बिना काम के अटैच कर दिया गया।
ओपीडी और इमरजेंसी की अव्यवस्था: डॉक्टर समय पर नहीं पहुंचते, जिससे लंबी लाइनें लगती हैं। इमरजेंसी में 24 घंटे एक डॉक्टर की ड्यूटी सुनिश्चित नहीं है। पर्ची काउंटर सिर्फ एक ही खुला रहता है, जबकि पुरुष, महिला और विकलांगों के लिए अलग-अलग होने चाहिए।
दवाओं की किल्लत: सरकारी दवाएं उपलब्ध नहीं, जन औषधि केंद्र बंद पड़े हैं। अस्पताल परिसर दवा कंपनियों के एजेंटों से भरा रहता है, और मरीज बाहर से महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर हैं। अस्पताल दवाओं के कर्ज में डूबा हुआ है।
एम्बुलेंस की हालत: 108 एम्बुलेंस और अन्य वाहन खराब हैं। टायर गंजे, सर्विस नहीं होती, जिससे रेफरल के दौरान मरीजों की जान जोखिम में पड़ जाती है। ड्राइवरों की मनमानी की शिकायतें आम हैं।
सफाई और अन्य मुद्दे: अस्पतालों में गंदगी का अंबार, बायोमेडिकल वेस्ट का ढेर, और रात में शराबियों का जमावड़ा। मरीजों के लिए डाइट चार्ट सार्वजनिक नहीं, गर्म पानी की व्यवस्था नहीं। पुराना महिला अस्पताल सिर्फ कागजों में है, जबकि करोड़ों की लागत से बना पेडियाट्रिक वार्ड इस्तेमाल नहीं हो रहा।
मेडिकल कैंप: प्राइवेट अस्पताल अपने प्रचार के लिए कैंप लगाते हैं, जबकि सरकारी स्तर पर हर 10 दिन में विशेषज्ञों और मेडिकल छात्रों के साथ कैंप होने चाहिए।
डसीला ने पत्र में लिखा है, “अगर कोई अप्रत्याशित घटना हुई, तो उसकी जिम्मेदारी अस्पताल प्रशासन, जिला प्रशासन और सरकार की होगी। अब जनता जागरूक हो गई है, और इलाज के दौरान मौतों की जवाबदेही तय करनी पड़ेगी।”
राजनीतिक कोण: कांग्रेस की रणनीति?
यह पत्र सिर्फ स्वास्थ्य मुद्दों तक सीमित नहीं लगता। कांग्रेस इसे उत्तराखंड सरकार के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पत्र की प्रतियां जिलाधिकारी, स्वास्थ्य महानिदेशक, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, राज्य मंत्री शिव सिंह बिष्ट, और स्थानीय विधायकों को भेजी गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह 2027 विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस की सक्रियता का हिस्सा हो सकता है, जहां स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास बड़े मुद्दे रहेंगे।
बागेश्वर जिला, जो हिमालयी क्षेत्र में है, पहले से ही दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से जूझ रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि सर्दियों में स्थिति और खराब हो जाती है, जब एम्बुलेंस बर्फ में फंस जाती हैं। एक स्थानीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमारे यहां डॉक्टर आते ही नहीं। हल्द्वानी या दिल्ली रेफर कर देते हैं, रास्ते में कितने मरीज दम तोड़ देते हैं।”
सरकार का पक्ष: क्या होगा एक्शन?
अभी तक सीएमओ कार्यालय या राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन सूत्रों के मुताबिक, पत्र मिलने के बाद जिला स्तर पर जांच शुरू हो सकती है। मुख्यमंत्री धामी, जो स्वास्थ्य सुधारों पर जोर देते रहे हैं, क्या इस चेतावनी को गंभीरता से लेंगे? या यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी साबित होगी?
कांग्रेस का यह कदम उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की बहस को फिर से गर्मा सकता है। अगर धरना हुआ, तो यह जिले का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन बन सकता है। फिलहाल, सभी की नजरें 20 दिसंबर पर टिकी हैं- क्या अस्पतालों में सुधार होगा, या सड़कों पर उतरेंगे लोग?