January 29, 2026

जी राम जी के साथ राम भरोसे मनरेगा मजदूर

अर्जुन राणा

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण गरीबों के लिए रोजगार का वैधानिक अधिकार था। इसे 2005 में यूपीए–1 सरकार ने अधिकार-आधारित विकास की अवधारणा के तहत लागू किया था, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में अकुशल मजदूरों को आपात स्थितियों में न्यूनतम आजीविका की गारंटी मिल सके और मजबूरी में होने वाले पलायन को रोका जा सके। मनरेगा ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि गरिमामय जीवन की न्यूनतम शर्तें राज्य की जिम्मेदारी हैं, न कि उसकी कृपा।
मनरेगा की सबसे अहम विशेषता यह थी कि यह मांग-आधारित कानून था। ग्रामीण मजदूर जब भी काम मांगता था, सरकार पर 15 दिनों के भीतर उसे रोजगार देने की कानूनी बाध्यता थी। काम न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता देने का भी प्रावधान था। मजदूरी का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती थी, जिससे गरीब राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ता था और योजना पूरे देश में समान रूप से लागू हो पाती थी।
अब मनरेगा को ‘विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन–ग्रामीण’ (जी-राम-जी) में बदलने का प्रस्ताव इसके मूल ढांचे को ही बदल देता है। यह योजना अब मांग-आधारित न रहकर सरकार की प्राथमिकताओं पर निर्भर होगी। इसका अर्थ है कि मजदूर के अधिकार के बजाय सरकार तय करेगी कि कब, कहां और कितना काम दिया जाएगा। इस बदलाव से रोजगार की कानूनी गारंटी समाप्त हो जाएगी और मनरेगा एक सामान्य कल्याणकारी योजना में बदलकर रह जाएगी।
प्रस्तावित बदलावों में राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ाना भी शामिल है। अब अधिकांश राज्यों को मजदूरी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा अपने कोष से देना होगा। इससे पहले ही आर्थिक संकट से जूझ रहे कई राज्य मनरेगा जैसे कार्यों को सीमित करने के लिए मजबूर होंगे। इसका सीधा असर मजदूरों पर पड़ेगा—काम के दिन घटेंगे, भुगतान में देरी बढ़ेगी और रोजगार की अनिश्चितता और गहरी होगी।
इसके अलावा जी-राम-जी को साल भर चलने वाली योजना नहीं रखा जाएगा और कृषि सीजन में इसे रोकने की बात कही जा रही है। जबकि मनरेगा का एक बड़ा योगदान यह रहा है कि उसने कृषि के ऑफ-सीजन में रोजगार देकर मजदूरों का पलायन रोका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह बनाए रखा। योजना के रुकने से मजदूरों को दोबारा शहरों की ओर पलायन या बेहद कम मजदूरी पर काम करने को मजबूर होना पड़ेगा।
इन बदलावों से सबसे अधिक लाभ निवेशकों और समृद्ध कृषि क्षेत्रों के बड़े किसानों को मिलेगा, जिन्हें सस्ती दरों पर मजदूर आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे। मनरेगा के कारण ग्रामीण मजदूरी दरों में जो बढ़ोतरी हुई थी और मजदूरों को जो मोलभाव की ताकत मिली थी, वही इन तबकों की इस कानून से शुरू से बड़ी शिकायत रही है। इसके उलट, भूमिहीन मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं की आजीविका सबसे अधिक असुरक्षित हो जाएगी।
अंततः मनरेगा को कमजोर करना ग्रामीण गरीबों से उनके अधिकार छीनने जैसा है। यह बदलाव राज्य की उस जिम्मेदारी से पीछे हटने का संकेत देता है, जिसके तहत वह नागरिकों को न्यूनतम रोजगार की गारंटी देता था। जिन मजदूरों के लिए मनरेगा आखिरी सहारा था, वे अब सचमुच राम भरोसे जीने को विवश हो जाएंगे, और “विकसित भारत” का सपना ग्रामीण भारत के लिए और भी दूर होता चला जाएगा।