उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति का मधुर उत्सव: घुघुती त्यौहार और बालमन की निष्कलुष परंपरा
अर्जुन राणा
गरुड, बागेश्वर । उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक परंपराएँ अपनी सरलता, भावनात्मक गहराई और प्रकृति से आत्मीय संबंध के लिए जानी जाती हैं। इन्हीं परंपराओं में एक अत्यंत स्नेहिल और बाल-केन्द्रित लोकपर्व है—घुघुती त्यौहार, जिसे कुमाऊँ अंचल में विशेष श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार केवल एक धार्मिक या सामाजिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन, प्रकृति और बाल-भावनाओं के सहज समन्वय का जीवंत प्रतीक है।
घुघुती त्यौहार मकर संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है और इसका केंद्रबिंदु बच्चे होते हैं। इस दिन घरों में गेहूँ के आटे से छोटे-छोटे पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें स्थानीय बोली में ‘घुघुते’ कहा जाता है। ये घुघुते प्रायः चिड़िया, मेढ़े, तलवार, डमरू या अन्य पारंपरिक आकृतियों के रूप में बनाए जाते हैं। इन्हें धागे में पिरोकर माला का रूप दिया जाता है और फिर बच्चों के गले में पहनाया जाता है। यह माला केवल आहार नहीं, बल्कि लोकविश्वास और परंपरा की एक सजीव अभिव्यक्ति होती है।
घुघुती त्यौहार का सबसे मनोहारी दृश्य तब देखने को मिलता है, जब बच्चे प्रातःकाल खुले आँगन या छतों पर जाकर कौवों को आमंत्रित करते हैं। वे मासूम स्वर में गाते हैं—“काले कौवा, काले घुघुती, माला खाले।” इस पुकार में न कोई औपचारिकता होती है, न कोई दिखावा; यह सीधे-सीधे बालमन की निष्कपटता और प्रकृति से संवाद की अद्भुत मिसाल होती है। लोकमान्यता है कि कौवे पूर्वजों के प्रतीक होते हैं, और उन्हें भोजन कराना पितरों को तृप्त करने जैसा पुण्य कार्य माना जाता है।
इस त्यौहार के माध्यम से बच्चों को साझा करने, करुणा और प्रकृति के प्रति सम्मान का संस्कार सहज रूप से प्राप्त होता है। घुघुती माला को पहले कौवों को अर्पित करना और उसके बाद स्वयं ग्रहण करना, त्याग और संतुलन का सूक्ष्म संदेश देता है। यही कारण है कि घुघुती त्यौहार केवल एक दिन का उत्सव न होकर पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक शिक्षा का माध्यम बन गया है।
आधुनिकता और शहरीकरण के इस दौर में, जब लोकपर्व धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं, घुघुती त्यौहार उत्तराखण्ड की जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। यह पर्व स्मरण कराता है कि संस्कृति केवल बड़े आयोजनों या भव्य अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि बच्चों की हँसी, लोकगीतों की तान और आटे से बने सरल पकवानों में भी जीवित रहती है। घुघुती त्यौहार वास्तव में उत्तराखण्ड की आत्मा का वह मधुर स्वर है, जो आज भी लोकजीवन में पूरी आत्मीयता के साथ गूंज रहा है।
