February 15, 2026

गरुड़ में रात को उभरा जनाक्रोश: लावारिश पशुओं के खिलाफ महिलाओं की हुंकार, तहसील में लगाई खेती बचाने की गुहार


गरुड , बागेश्वर। गरुड की शांत वादियों में सोमवार की रात लगभग नौ बजे एक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ, जिसने ग्रामीण आक्रोश की गहराई और महिलाओं की सजगता को स्पष्ट कर दिया। वज्यूला-पासतोली क्षेत्र से दर्जनों लावारिश पशुओं को लेकर महिलाएं तहसील परिसर पहुंचीं तो मानो वर्षों से दबा असंतोष मुखर हो उठा। सूचना मिलते ही आसपास के गांवों—पूरड़ा और बैजनाथ—की महिलाएं भी तहसील में एकत्रित हो गईं। वातावरण में व्याप्त पीड़ा और प्रतिरोध यह संकेत दे रहे थे कि अब “पानी सिर से ऊपर” गुजर चुका है।
बैजनाथ की महिला पूजा गोस्वामी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दूर-दराज़ के गांवों से लावारिश पशुओं को बैजनाथ और गरुड़ क्षेत्र में लाकर छोड़ा जा रहा है, जिससे स्थानीय काश्तकारों की फसलें चौपट हो रही हैं। उनके स्वर में वह वेदना थी, जो तब जन्म लेती है जब “ऊँट के मुँह में जीरा” जैसी सरकारी राहत के बीच किसानों की मेहनत पर बार-बार पानी फिर जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन पशुओं द्वारा खेतों में तैयार सब्ज़ियों और अन्न को लगातार नुकसान पहुंचाया जा रहा है, जिससे किसानों की कमर टूटती जा रही है।
ग्राम प्रधान पूरड़ा राजेंद्र सिंह ने भी इस घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार महिलाओं द्वारा लावारिश पशुओं को गरुड़ लाया जा रहा है, उससे स्थानीय काश्तकारों में तीव्र आक्रोश व्याप्त है। उनका मत था कि यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो स्थिति “आग में घी” डालने जैसी हो सकती है। ग्रामीणों का प्रश्न है कि आखिर एक क्षेत्र की समस्या का बोझ दूसरे क्षेत्र के किसानों पर क्यों डाला जा रहा है।
महिलाओं ने यह भी आरोप लगाया कि पशुपालन विभाग द्वारा कई पशुओं के कानों में टैग लगाए गए हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे पूर्णतः अनपहचाने नहीं हैं। ऐसे में प्रशासन द्वारा तथ्यात्मक जांच कर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। उनका कहना था कि एक ओर दिनभर बंदर घरों के भीतर से सामान और खेतों की सब्ज़ियां उठा ले जाते हैं, दूसरी ओर आवारा पशु उनकी मेहनत की फसल को रौंद देते हैं। रात के समय जंगली सुवरों का आतंक अलग से है। इन परिस्थितियों में जब सरकार किसानों की आय दुगुनी करने के वादों का “लॉलीपॉप” थमाती है, तो वह आश्वासन ग्रामीणों को खोखला प्रतीत होता है। सच तो यह है कि “जिसकी लाठी उसकी भैंस” जैसी स्थिति में किसान स्वयं को शासन प्रशासन के सामने असहाय महसूस कर रहे हैं।
इस उग्र होते वातावरण के बीच तहसीलदार निशा रानी ने रात में ही महिलाओं की समस्याएं सुनीं, उनके नाम दर्ज किए और शीघ्र कार्रवाई का आश्वासन दिया। प्रशासन की यह तत्परता निश्चित रूप से सराहनीय है, किंतु अब ग्रामीणों की अपेक्षा आश्वासन से आगे बढ़कर ठोस समाधान की है।
गरुड़ की यह घटना केवल लावारिश पशुओं की समस्या भर नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की बहुस्तरीय चुनौतियों का प्रतीक है। जब खेतों की हरियाली पर संकट मंडराता है, तब केवल फसल ही नहीं, किसान का मनोबल भी आहत होता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस आक्रोश को शांति में और समस्या को समाधान में कितनी शीघ्रता से परिवर्तित कर पाता है—क्योंकि ग्रामीणों के लिए यह प्रश्न अब “आर-पार की लड़ाई” का रूप ले चुका हैं।

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