February 21, 2026

पर्वतीय अस्मिता की पुनर्प्रतिष्ठा का संकल्प: बागेश्वर पहुँची उक्रांद की कुमाऊँ क्रांति संवाद यात्रा

बागेश्वर , गरुड । बागेश्वर की शांत वादियों में आज राजनीतिक चेतना की एक सशक्त ध्वनि सुनाई दी, जब की “कुमाऊँ क्रांति संवाद यात्रा” कौसानी और गरुड़ होते हुए बागेश्वर पहुँची। यह यात्रा दल के युवा प्रकोष्ठ के केंद्रीय अध्यक्ष के नेतृत्व में संचालित हो रही है, जिसका उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों के मूल प्रश्नों—जल, जंगल और जमीन—को केंद्र में रखकर जनचेतना को पुनर्जीवित करना है।

यात्रा के दौरान विभिन्न पड़ावों पर स्थानीय नागरिकों, युवाओं और सामाजिक संगठनों के साथ व्यापक जनसंवाद आयोजित किए गए। संवाद के इन सत्रों में पहाड़ से हो रहे पलायन, सीमित रोजगार अवसरों, वनाधिकार, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे विषयों पर गंभीर विमर्श हुआ। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि राज्य गठन के वर्षों बाद भी पर्वतीय अंचलों की अपेक्षाएँ अधूरी हैं और विकास की धारा मैदानी क्षेत्रों की ओर अधिक प्रवाहित हुई है।

बागेश्वर स्थित टीआरसी सभागार में आयोजित पत्रकार वार्ता में आशीष नेगी ने स्पष्ट और दृढ़ स्वर में कहा कि उत्तराखंड क्रांति दल इस बार पहाड़ की लड़ाई को अधिक संगठित, वैचारिक और जनसमर्थन आधारित स्वरूप में लड़ेगा। उन्होंने कहा कि उक्रांद केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि उत्तराखंड आंदोलन की मूल भावना का प्रतिनिधि है। उनका कथन था कि जब तक स्थानीय समुदायों को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर प्राथमिक अधिकार और निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी नहीं मिलेगी, तब तक समग्र विकास की परिकल्पना अधूरी रहेगी।

नेगी ने युवाओं से आह्वान किया कि वे क्षेत्रीय अस्मिता और स्वाभिमान की इस लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाएँ। उन्होंने कहा कि पहाड़ की पहचान उसकी सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक संपदा और संघर्षशील समाज में निहित है, जिसे संरक्षित और सशक्त करना आज की आवश्यकता है।

इस अवसर पर जिलाध्यक्ष मनोज जोशी, महिला जिलाध्यक्ष पूजा मेहरा, युवा प्रकोष्ठ जिला अध्यक्ष भाष्कर बोरा, गरुड़ ब्लॉक अध्यक्ष गिरीश कोरंगा, भुवन काण्डपाल, एडवोकेट मयंक चौबे, कैलाश चंदोला, योगेश जोशी और रोहित थायत सहित अनेक पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में यह विश्वास व्यक्त किया कि कुमाऊँ क्रांति संवाद यात्रा पर्वतीय जनमानस में नई ऊर्जा और विश्वास का संचार करेगी।

कुल मिलाकर, यह यात्रा केवल राजनीतिक संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि उत्तराखंड की मूल चेतना को पुनः जागृत करने का एक प्रयास बनती दिखाई दे रही है—एक ऐसा प्रयास, जो पहाड़ की अस्मिता, अधिकार और भविष्य की दिशा तय करने की आकांक्षा से प्रेरित है।

You may have missed