April 18, 2026

हिमालय की आत्मा से उठी आवाज़ — ‘ ऐना ’ का शीर्षक गीत बना लोकसंस्कृति का जीवंत दस्तावेज, अब कहानी बनकर समाज को दिखा रहा आईना

अर्जुन राणा


बागेश्वर/ गरुड । उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा, लोकजीवन की गहराई और हिमालय की अनुपम सुंदरता को सजीव करने वाली बहुप्रतीक्षित फिल्म AINA – A Tale from the Heart of the Himalayas इन दिनों अपने शीर्षक गीत “देखी देखी ऐना” के रिलीज के साथ चर्चा के केंद्र में है। यह गीत केवल एक संगीतमय प्रस्तुति नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति को समर्पित एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है, जिसे स्वर्गीय लोकगायक दीवान कनवाल की स्मृति में प्रस्तुत किया गया है। उनकी स्वरधारा आज भी पहाड़ों की वादियों में गूंजती हुई महसूस होती है।
फिल्म के इस गीत को डॉ अजय दौण्डियाल और स्वयं दीवान कंवाल की आवाज़ों ने जीवंत बनाया है, जबकि इसके संवेदनशील बोल जगदीश तिवारी ने रचे हैं और संगीत रंजीत सिंह ने दिया है। यही नहीं, जगदीश तिवारी ने इस फिल्म का निर्देशन भी किया है, जिसे एक सांस्कृतिक मिशन के रूप में देखा जा रहा है।
लेकिन ऐना केवल गीत या दृश्य सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी मूल शक्ति इसकी कहानी में निहित है। यह कथा उत्तराखंड के एक पहाड़ी गाँव की उस मार्मिक सच्चाई को सामने लाती है, जहाँ एक माँ पिछले दस वर्षों से लकवे की शिकार है। उसका बेटा गोपिया मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करता है, जबकि बहू गैंदा घर, छोटे बेटे ‘ऐना’ और बीमार सास की सेवा में पूरी निष्ठा से जुटी रहती है। यह कहानी तीन पीढ़ियों के बीच प्रेम, त्याग और जिम्मेदारी की उस डोर को दिखाती है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी टूटती नहीं।
फिल्म का एक अत्यंत संवेदनशील दृश्य उस समय सामने आता है, जब गोपिया की मुलाकात गाँव के प्राथमिक विद्यालय के हेडमास्टर से होती है। बच्चों के अभाव में स्कूल का बंद होने की कगार पर होना, पहाड़ों से हो रहे पलायन की भयावह सच्चाई को उजागर करता है। यह केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि उत्तराखंड के बदलते सामाजिक ताने-बाने का गहरा संकेत है।
फिल्म समाज के उस कटु यथार्थ पर भी प्रहार करती है, जहाँ आधुनिकता और सामाजिक प्रतिष्ठा की आड़ में लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता को अकेला छोड़ देते हैं या वृद्धाश्रम भेज देते हैं। ऐना ऐसे लोगों के सामने एक ‘आईना’ रखती है, जो उन्हें अपनी संवेदनाओं और जिम्मेदारियों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित करता है।
प्रतीकों के स्तर पर भी फिल्म अत्यंत सशक्त है। ‘टोकरी’ श्रम और जिम्मेदारियों का प्रतीक बनकर उभरती है, जबकि ‘फल’ रिश्तों की मिठास और कड़वाहट दोनों को दर्शाते हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से फिल्म अपने संदेश को और अधिक गहराई से स्थापित करती है कि वास्तविक सुंदरता बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि सेवा, ममता और प्रेम में निहित है।
फिल्म में बॉलीवुड अभिनेता हेमंत पांडे , वीरेंद्र पंडियाल, अंकिता परिहार , गोपा नयाल , राधा तिवारी और भुवन चंद जोशी जैसे कलाकारों ने अपने अभिनय से कथा को जीवंत किया है, जबकि बाल कलाकार भावेश भट्ट ने विशेष छाप छोड़ी है। निर्माता पूजा सिंह के निर्देशन में बनी इस फिल्म की सिनेमैटोग्राफी कुलदीप रावत ने की है, जिसने शीतलाखेत, रानीखेत, बसार और कठपुडिया जैसे स्थलों की प्राकृतिक भव्यता को प्रभावशाली ढंग से उकेरा है।

यहाँ यह भी आपको बताते चले कि इस फ़िल्म की निर्माता पूजा सिंह की यह 5वी फ़िल्म है।और सबसे बड़ी गर्व की बात यह है कि पूजा सिंह गरुड क्षेत्र के सरोली गाँव की निवासी है।उल्लेखनीय है कि यह फिल्म अब तक 15 पुरस्कार अपने नाम कर चुकी है और जल्द ही अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की तैयारी में है। यह उपलब्धि न केवल फिल्म की गुणवत्ता को दर्शाती है, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना को वैश्विक मंच तक पहुंचाने का सशक्त संकेत भी देती है।
अंततः ऐना एक ऐसी सिनेमाई कृति के रूप में उभरती है, जो दर्शकों को भीतर तक झकझोर देती है और एक गूंज छोड़ जाती है—
“हर घर में एक आईना होता है, बस कोई उसमें झाँकने की हिम्मत करे।”

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