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October 14, 2026

विकास करते 2 न बिगड़ जाये वातावरण

 

 

अर्जुन राणा

ग्लोबल वार्मिंग से हो रहा जलवायु परिवर्तन दुनिया के सामाजिक-आर्थिक विकास पर गहरा असर डाल रहा है। बीती आधी सदी में इसके कारण धनी देश और भी धनी तथा गरीब देश और गरीब होते गए हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था को इसके चलते 31 फीसदी का नुकसान हुआ है। यानी ग्लोबल वार्मिंग का नकारात्मक असर नहीं होता तो हमारी इकोनॉमी अभी की स्थिति से तकरीबन एक तिहाई और यादा मजबूत होती। साफ है कि हमें वातावरण का संतुलन बिगाडऩे की कीमत चुकानी पड़ रही है। इस बदलाव का खाका स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में खींचा है, जो अमेरिका के प्रतिष्ठित रिसर्च जर्नल ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ दि नैशनल अकैडमी ऑफ साइंसेजÓ (पीएनएएस) में प्रकाशित हुआ है।
इसके मुताबिक सूडान को 36 फीसदी, नाइजीरिया को 29, इंडोनेशिया को 27 और ब्राजील को 25 पर्सेंट का नुकसान हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1961 से 2010 के बीच विभिन्न देशों के बीच पैदा हुई कुल आर्थिक असमानता के एक चौथाई हिस्से की वजह मानव गतिविधियों से हो रही ग्लोबल वार्मिंग ही है। इस अध्ययन में एक तरफ यह देखा गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण किस देश का तापमान कितना बढ़ा, फिर यह आकलन किया गया कि ऐसा न होता तो आर्थिक उत्पादन कितना होता। इस तरह पिछले 50 वर्षों में 165 देशों के बढ़ते तापमान और जीडीपी के रिश्तों का हिसाब लगाया गया। दिलचस्प बात यह कि ग्लोबल वार्मिंग से जिन ठंडे देशों का तापमान बढ़ा है, उन्हें इसका लाभ भी हुआ है। जैसे नॉर्वे का तापमान बढ़कर मानक तापमान के करीब हुआ तो उसे इसका फायदा बढ़ी ग्रोथ रेट के रूप में मिला। इसके उलट भारत जैसे गर्म मुल्क का तापमान बढऩे की कीमत उसे आर्थिक नुकसान के रूप में चुकानी पड़ रही है। बढ़ती ग्लोबल वार्मिग ने जैव विविधता पर गहरी चोट की है। करीब दस लाख प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई हैं। साफ हवा, शुद्ध पेयजल, कार्बन डाइऑक्साइड सोखने वाले वनों, परागण में सहायक कीड़ों, प्रोटीन से भरपूर मछलियों और तूफान रोकने वाले मैंग्रोव्स की कमी से उनका जीवन खतरे में पड़ गया है।
यह बात संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ‘यूएन असेसमेंट ऑफ साइंटिफिक लिटरेचर ऑन दि स्टेट ऑफ नेचरÓ में कही गई है। 130 देशों के प्रतिनिधि 29 अप्रैल से पेरिस में होने वाले समेलन में इस पर विचार करेंगे। रिपोर्ट तैयार करने वाली समिति के प्रमुख रॉबर्ट वाटसन का कहना है कि भोजन और ऊर्जा का उत्पादन हम जिस तरीके से कर रहे हैं, उससे प्रकृति को भारी नुकसान पहुंच रहा है। जंगलों की कटाई, खेती और पशुपालन ग्रीनहाउस गैसों के एक तिहाई उत्सर्जन के लिए जवाबदेह है, जिससे इको सिस्टम संकट में आ गया है। जाहिर है, पूरी दुनिया साथ आकर ही इसे रोकने के लिए कुछ कर सकती है। आज जब अमेरिका जैसे शीर्ष उत्सर्जक देश ने इस मुद्दे पर अपनी जिमेदारी से पल्ला झाड़ लिया है, तब हालात बेकाबू होने से पहले उसका रवैया बदलने की प्रार्थना ही की जा सकती है।

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