March 17, 2026

भारत मे उच्च शिक्षा की दशा

आखरीआंख
भारत की उच शिक्षा के लिए यह मायूस करने वाली खबर है। टाइस हायर एजुकेशन (टीएचई) की ओर से जारी दुनिया के 300 श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की वर्ल्ड रैंकिंग सूची में एक भी भारतीय यूनिवर्सिटी को जगह नहीं मिली है। 2012 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है। पिछले साल नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु ने टॉप 300 की सूची में जगह बनाई थी, लेकिन इस बार वह इससे बाहर है। उसके अलावा छह और भारतीय विश्वविद्यालयों की रैकिंग में भी इस साल गिरावट आई है। हां, इस बात पर संतोष जरूर जताया जा सकता है कि शीर्ष 500 विश्वविद्यालयों की सूची में भारत के 6 संस्थानों को जगह मिली है, जबकि पिछली बार 5 को ही गौरव प्राप्त हुआ था।
शोध का माहौल, रिसर्च पेपर्स का वैश्विक स्तर पर उद्धृत किया जाना, पढ़ाई का माहौल और उसकी गुणवत्ता, पेटेंट आदि से औद्योगिक आय जैसे पैमानों पर यह सूची तैयार होती है। केंद्र सरकार उच शिक्षा की सूरत बदलने के लिए कई तरह की कोशिशें कर रही है, जिनके नतीजे आने में वक्त लगेगा। इसलिए अभी इस रैंकिंग से नतीजा निकालने की हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए। लेकिन इसे एक चेतावनी की तरह तो लेना ही होगा। अंतरराष्ट्रीय मानकों पर कुछ हद तक हमारे तकनीकी संस्थान ही खरे उतर पाते हैं। बाकी संस्थानों का आलम यह है कि जेएनयू ने पहली बार 601-800 समूह में जगह बनाई है।
पिछले कुछ समय में उच शिक्षा के कई नए संस्थान खुले हैं। निजी शिक्षा संस्थाओं में वृद्धि हुई है। कई नए कार्यक्रम विदेशी संस्थानों के साथ साझेदारी के साथ शुरू हुए हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर भी बढ़ा है। लेकिन असली चीज फिर भी गायब है- मौलिकता और सृजनशीलता। सरकार ने साइंस-टेक्नॉलजी में रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए आकर्षक छात्रवृत्ति घोषित की, पर छात्रों ने शोध के बजाय बीटेक करते ही नौकरी पकडऩा बेहतर समझा। इससे पता चलता है कि सामाजिक माहौल अभी फंडामेंटल रिसर्च और क्रिएटिविटी के पक्ष में नहीं है। जिन्हें शोध करना होता है, वे विदेश का रुख कर लेते हैं। बेहतर फैकल्टी बहुत बड़ी समस्या है। बाहर से विशेषज्ञ बुलाने की बात कागजों तक सीमित है।
प्राइवेट सेक्टर के योगदान का आकलन नहीं हो पाया है। सरकार यूजीसी और एआईसीटीई का विलय कर उच शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करना चाहती है, पर इसकी सफलता को लेकर संदेह बना हुआ है। संसार के महानतम शिक्षण संस्थान अध्ययन और अनुसंधान के क्षेत्र में मानक खास तौर पर इसलिए कायम कर पाए क्योंकि उन्हें पर्याप्त स्वायत्तता मिली। न तो वे सरकारी ढांचे में बंधकर रहे, न ही अपने खर्चे के लिए सत्ता पर आश्रित रहे। भारत को भी एक नॉलेज पावर बनना है तो सरकार को उच शिक्षा संस्थानों का हौसला बढ़ाना होगा। इसके लिए वह कुछ संसाधनों की व्यवस्था जरूर करे, पर उच शिक्षा का ढांचा शिक्षाविदों को ही गढऩे दे। यह तभी हो पाएगा जब सरकार शिक्षा में अपना अजेंडा लागू करने का मोह छोड़ेगी।