March 19, 2026

जंगल से जुड़ाव का प्रबंधन

उत्तराखंड के पिथौड़ागढ़ जिले में एक गांव है, सरमोली। यहां की वन पंचायत को राज्य की सबसे बेहतरीन जगहों में गिना जाता है। वजह! इस वन पंचायत की सरपंच मल्लिका विर्दी कहती हैं, ‘जहां भी जंगल लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं, जंगल स्वस्थ हैं।Ó असल में, सरमोली वन पंचायत ने स्वत: संज्ञान लेकर सामुदायिक वनों का प्रबंधन शुरू किया है। विर्दी के गांव में, समुदाय के लोग जंगलों से झाडिय़ां साफ करते हैं, खरपतवार निकालते हैं और अच्छी गुणवत्ता वाली घास हासिल करते हैं। उत्तराखंड की खासियत है कि हर वन पंचायत स्थानीय जंगल के उपयोग, प्रबंधन और सुरक्षा के लिए अपने नियम खुद बनाती है। ये नियम वनरक्षकों के चयन से लेकर बकाएदारों को दंडित करने तक हैं। वन पंचायतें ज्यादातर स्वतंत्र रूप से काम करती हैं, लेकिन सहयोग की मिसालें भी मिलती हैं। सरमोली में ही, जाड़ों में ग्रामीणों को अपने ही जंगल से पर्याप्त घास नहीं मिलती। वे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए शंखधुरा के निकटवर्ती गांव में जंगल जाते हैं। यहां जून से सितंबर तक मानसून में ग्रामीणों और उनके मवेशियों के जंगल में जाने की मनाही होती है।
वनोपज के इस्तेमाल को लेकर वनाधिकार कानून भी है। पर, कानून लागू करने में किस स्तर की हीला-हवाली होती है, वह छिपी नहीं है। मसलन,  झारखंड में  संताल जनजाति की स्त्रियों को जंगल जाकर साल के पत्ते, दातुन आदि लाते देखा है। वे शाम को लौटते वक्त कई दफा लैंटाना (झाड़ी) भी काट लाती हैं, जलावन के लिए। पर, उन्हें यह छिपाकर लाना होता है। अगर वन विभाग चाहे तो लैंटाना जैसी प्रजाति, जिसके कर्नाटक के जंगल में प्रति वर्ग किमी उन्मूलन के लिए दस लाख रुपये से भी अधिक की लागत आती है, का सफाया मुफ्त में हो सकता है। वन विभाग चाहे तो स्थानीय लोगों को जंगल के भीतर से इस झाड़ी को काटकर लाने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। अक्सर ओडिशा के नियामगिरि के जरपा गांव में एक कोंध-डंगरिया महिला की बात याद आती है। उसने  कहा था-ये हमारे नियामराजा हैं, हमारे घर, हमारा मंदिर, कचहरी, अस्पताल सब। जंगलों को अगर इस निगाह से देखने लगें तो वन संरक्षण का मामला सरल हो सकता है। पर सवाल नीयत पर जाकर अटक जाता है।