September 10, 2026

भाजपा को हार हजम नहीं होती!


विकसित और सभ्य लोकतांत्रिक देशों के मुकाबले भारत में कई कमियां हैं। लेकिन एक शानदार खूबी यह है कि यहां हर चुनाव के बाद बहुत शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता का हस्तांतरण होता रहा है। चुनाव चाहे जितनी भी कड़वाहट के साथ लड़ा जाए लेकिन नतीजों के बाद पार्टियां उसे सहज भाव से स्वीकार करती हैं। जीतने के सौ फीसदी भरोसे में बैठी पार्टियां हार जाती हैं और चुपचाप सत्ता से बाहर हो जाती हैं। याद करें अटल बिहारी वाजपेयी का 2004 का चुनाव। खुद वाजपेयी और पूरी पार्टी उस भरोसे में थे कि वे जीत रहे हैं। लेकिन भाजपा से सिर्फ सात सीटें ज्यादा मिलीं कांग्रेस को और वाजपेयी सत्ता छोड़ कर चले गए। उससे भी पहले इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए चुनाव में इंदिरा गांधी ने गरिमापूर्ण ढंग से सत्ता छोड़ी।
सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद 1989 में राजीव गांधी ने सत्ता छोड़ी।
भारत के लोकतंत्र की वह खूबी अब खतरे में है क्योंकि भाजपा अब हर चुनाव प्रतिष्ठा के चुनाव की तरह लड़ती है, उसका लक्ष्य हर हाल में सत्ता हासिल करना होता है और जहां वह हार जाती है या सत्ता से बाहर हो जाती है वहां वह नतीजे को हजम नहीं कर पाती है। वह जीती हुई या सत्तारूढ़ हुई पार्टी को लगातार अस्थिर करने की कोशिश करती है, जिससे अराजकता की स्थिति पैदा होती है।
इसे एक के बाद एक राज्यों में इ देखा जा सकता है। महाराष्ट्र में भाजपा सत्ता से बाहर हुई। चुनाव बाद गठबंधन करके तीन पार्टियों ने सरकार बनाई। लेकिन नतीजों के बाद से ही पहले तो भाजपा ने एनसीपी के अजित पवार की मदद से अपनी सरकार बनाई लेकिन वह सरकार चार दिन में गिर गई। उसके बाद भी भाजपा ने प्रयास नहीं छोड़ा और अंतत: ढाई साल के बाद भाजपा ने महा विकास अघाड़ी की सरकार गिरा दी। चाहे इसके लिए उसे शिव सेना के बागी एकनाथ शिंदे को सीएम बनाना पड़ा और खुद अपने पूर्व मुख्यमंत्री को उप मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। इसी तरह मध्य प्रदेश में भी लगातार 15 साल सत्ता में रहने के बाद भाजपा हारी और सत्ता से बाहर हुई लेकिन उसे न अपनी हार कबूल हुई और न नतीजे हजम हुए। सो, उसने सरकार को अस्थिर करने का प्रयास जारी रखा और डेढ़ साल बाद ही कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार गिरा कर अपनी सरकार बना ली। जब तक उद्धव ठाकरे की सरकार चली तब तक शिव सेना, एनसीपी और कांग्रेस नेताओं के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों की जांच चलती रही

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