March 26, 2026

कहा हैं पार्टी विथ डिफरेंस????


    बीजेपी परिवारवाद के मुद्दे पर कांग्रेस और अन्य दलों की तीखी आलोचना करती आई है। इस आलोचना का तात्पर्य यह नहीं है कि भाजपा भी इन्हीं दलों की तरह आचरण करने लगे और दलील यह दे कि ऐसा तो उनके शासन में भी होता रहा है, इसलिए इसमें गलत क्या है? भाजपा की केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अब्दुल नजीर को आंध्रप्रदेश का राज्यपाल नियुक्त करने के मामले में ऐसी ही दलील दे रही है। भाजपा यह कहते हुए नजीर की नियुक्ति को जायज ठहरा रही है कि ऐसा तो कांग्रेस के शासन में भी होता रहा है। भाजपा यह भूल गई कि कांग्रेस ऐसे कारनामों के कारण सत्ता से बाहर है। भाजपा अपनी सुविधा से यह नहीं कर सकती कि जिसमें उसे नुकसान नजर आए उसमें काग्रेस को कोसे और जहां छिपा हुआ एजेंडा लागू करना हो, वहां कांग्रेस का उदाहरण पेश कर दे। इस नकारात्मक उदाहरण से निश्चित तौर पर भाजपा और न्यायाधीशों की छवि पर उंगलियां उठेंगी। न्यायाधीश नजीर का गलत उदाहरण पेश करके भाजपा अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती। सवाल यह नहीं है कि नजीर ने सुप्रीम कोर्ट में जज रहते हुए अयोध्या और तीन तलाक के मुद्दे पर केंद्र सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया था। बड़ा सवाल न्यायपालिका की नैतिकता और शुचिता का है जिसे बनाए रखने की मौजूदा दौर में कम से कम किसी राजनीतिक दल से तो अपेक्षा नहीं की जा सकती। नजीर को राज्यपाल बनाए जाना एक तरह से सेवानिवृत्त होने के बाद न्यायाधीशों के पुनर्वास का रास्ता देना है। अर्थात सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स के ऐसे जज जिन्होंने सरकारों के पक्ष में फैसला दिया होगा, वे सत्ताधारी दलों के कृपापात्र होंगे। जब भी सही मौका मिलेगा सरकार उनका पुनर्वास करके उन्हें अनुग्रहित कर देगी। यह परिपाटी न सिर्फ न्यायपालिका बल्कि देश की न्याय व्यवस्था के भी अनुकूल नहीं है। किसी लालच या आकर्षण के बूते दिए गए फैसलों में यह पता लगाना आसान नहीं होगा कि इसमें सच्चाई कितनी है। यही माना जाएगा कि सरकार का साथ देने के फैसलों के एवज में किसी प्रशासनिक या संवैधानिक पद पर नियुक्त करके न्यायाधीश को उपकृत किया गया है। राजनीतिक दलों के नेताओं के दामन तो दागदार होते रहे हैं, किन्तु यह बुराई यदि न्यायपालिका तक पहुंच गई तो न्याय पर आम लोगों का विश्वास कायम रखना मुश्किल हो जाएगा। सेवानिवृत्त होकर किसी पद को लेने पर न्यायाधीश के कार्यकाल के दौरान दिए गए फैसलों पर सवाल उठेंगे, जैसे कि जज नजीर की नियुक्ति को लेकर उठ रहे हैं। देश में पहले ही न्याय पाने वालों की लंबी कतार लगी हुई है। न्याय पाने के लिए होने वाला खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। न्यायपालिका जजों की कमी से जूझ रही है । जटिल न्यायिक प्रक्रिया से लोगों की हताशा बढ़ रही है। ऊपर से यदि यह प्रवृत्ति न्यायाधीशों की घर कर गई कि सेवानिवृत्ति के बाद सरकार उनका भला कर देगी, तो न्यायिक फैसलों से आम लोगों का न्यायपालिका पर बचा हुआ विश्वास भी दरकने लगेगा। सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की ताजपोशी से इस बात को बल मिलता है कि केंद्र सरकार किसी न किसी रूप में न्यायपालिका को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है ।
  राज्यपाल का पद कहने को संवैधानिक होता है, किन्तु यथार्थ में राज्यपाल के राजनीतिक विवादों में घिरे रहने के कई उदाहरण मौजूद हैं। गैर-भाजपा शासित राज्यों में राज्यपाल और राज्य सरकार में टकराव की घटनाएं होती रहती हैं। उपराष्ट्रपति बने जगदीप धनखड़ इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। धनखड़ जब तक पश्चिमी बंगाल के राज्यपाल रहे, तब तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से उनका टकराव बना रहा। तमिलनाडु सहित कई राज्यों में राज्यपालों के खिलाफ राजनीतिक धरना-प्रदर्शन तक हुए हैं। राज्यपालों पर भ्रष्टाचार सहित मनमानी करने के कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सुप्रीम कोर्ट के जज रहे नजीर के आंध्रप्रदेश का राज्यपाल बनने पर ऐसी नौबत नहीं आयेगी । जैसे भाजपा और आन्ध्र सरकार के बीच कई बार टकराहट हो चुकी है। यदि राजनीतिक धरना-प्रदर्शन के हालात बनते हैं तो वह सिर्फ राज्यपाल के खिलाफ ही नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज के खिलाफ भी होंगे। सुप्रीम कोर्ट में जज रहने के कारण राज्यपाल को विवादों में घसीटा जाएगा। राजनीति में चूंकि आरोप-प्रत्यारोपों की कोई सीमा नहीं है, इसलिए विवाद किसी भी हद तक जाने पर इसकी चपेट में सेवानिवृत्ति के बाद राज्यपाल बने जज भी आयेंगे । अदालतों को ऐसे मामलों की सुनवाई करनी पड़ेगी जिसमें सुप्रीम कोर्ट का जज शामिल रहा हो। यदि अदालत ने राज्यपाल के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी कर दी तो परोक्ष तौर पर न्यायपालिका पर भी होगी, क्योंकि राज्यपाल पूर्व में जज रह चुके हैं। विवाद की ऐसी स्थितियों से बेशक राजनीतिक दलों के स्वार्थ सधते हों, किन्तु इससे न्यायपालिका के प्रति जनभावना में बनी आस्था खंडित हुए बगैर नहीं रहेगी । समय है कि राजनीति में शुचिता आये ।