March 22, 2026

करीबी दरिंदों से बचके



यकीन मानिए, इन दिनों सुबह सोकर उठने के बाद अखबार पढऩे में डर सा लगने लगता है। प्रति दिन इतनी भयानक खबरें छपती हैं कि दिल दहल जाता है।
कभी-कभी तो लगता है कि हमारे आसपास ही कुछ राक्षस घूम रहे हैं। हां, उनके चेहरे-मोहरे सामान्य मनुष्यों की तरह के ही हैं। इनके लिए किसी का कत्ल करना सामान्य सी बात है। ये अपने किसी परिचित के शरीर के टुकड़े-टुकड़े करने से जरा सा भी विचलित नहीं होते। ये उसे ही मार डालते हैं, जिनसे इन्होंने शादी करने का वादा किया होता है, या झूठी शादी रचाई होती है।
राजधानी दिल्ली में कुछ समय के दौरान हुई दो ऐसी घटनाओं पर गौर करें। पहला केस श्रद्धा वालकर तथा आफताब पूनावाला का है। दोनों मुंबई के रहने वाले थे और नौकरी करने का बहाना बनाकर दिल्ली आ गए थे। शादी किए बगैर ही साथ-साथ रह रहे थे। इनके पड़ोसियों को लगता था कि ये पति-पत्नी हैं। इनके बीच में आपस में इस तरह का क्या हुआ कि आफताब ने श्रद्धा को नृशंसतापूर्वक मारकर टुकड़े-टुकड़े कर डाले। सबसे हैरानी की बात यह है कि उसमें किसी तरह का अपराधबोध नहीं है। उसने पुलिस से पूछताछ के दौरान एक बार भी यह नहीं कहा कि उसे अपने कृत्य पर अफसोस है।
अब दूसरा केस लीजिए। राजधानी में साहिल गहलोत नाम के एक शख्स ने अपनी मित्र निक्की यादव का कत्ल करके उसके शव को अपने फ्रीज में रख दिया। इतने जघन्य कांड को अंजाम देने के बाद साहिल ने एक अन्य लडक़ी से विवाह भी रचा लिया यानी उसने एक को मार दिया और दूसरी लडक़ी का जीवन तबाह कर दिया। श्रद्धा और निक्की यादव जैसी लड़कियों के साथ सहानुभूति रखते हुए इतना तो कहना ही होगा ये बदनसीब लड़कियां सच्चा दोस्त पहचान पाने में असफल रहीं। ये पढ़ी-लिखी थीं। ये आफताब तथा साहिल को पहचान पाने में नाकामयाब रहीं। आखिर, आफताब और साहिल में वे कौन से गुण थे जिनके चलते श्रद्धा  तथा निक्की ने अपने घरवालों तथा समाज की परवाह किए बगैर अपना सब कुछ अपने इतने धूर्त मित्रों को समर्पित कर दिया? आपको वयस्क होने पर अपने कॅरियर से लेकर जीवन साथी चुनने का अधिकार तो निश्चित रूप से है। इस मसले पर कोई विवाद नहीं है पर आपको ये फैसले बहुत सोच समझकर लेने होंगे। आप भावनाओं में बहकर कोई भी कदम नहीं उठा सकते। अगर आप आंखों में पट्टी बांधकर फैसले लेंगे तो नतीजे ऐसे ही भयानक आ सकते हैं। यही तो श्रद्धा और निक्की यादव के साथ हुआ। जैसा कि पुलिस ने बताया कि श्रद्धा के पिता ने अपनी बेटी को बहुत समझाया भी था कि वह आफताब से संबंध न रखे। श्रद्धा के पिता को उसमें तमाम कमियां-खामियां नजर आ रही थीं। उन्होंने जिंदगी को करीब से देखा था। उन्हें समझ आ रहा था कि वह संदिग्ध किस्म का इंसान है पर श्रद्धा ने अपने पिता की एक नहीं सुनी। उनकी नेक सलाह को दरकिनार करते हुए आफताब से संबंध बनाए रखने का फैसला लिया और अपने माता-पिता का घर तक छोड़ दिया। उसके बाद जो कुछ हुआ वह सबको पता चल चुका है। निक्की यादव की कहानी भी लगभग श्रद्धा ही तरह है।
पता नहीं रोज कितनी मासूम श्रद्धा और निक्की उस जाल में फंसती हैं, जिन्हें आफताब और साहिल जैसे राक्षस दिल आपराधिक प्रवृत्ति वाले लडक़े बिछाते हैं। ये लडक़े सीधी-सरल लड़कियों को झूठे वादे करके उनका विश्वास जीत लेते हैं। दरअसल, बीते बीस-पच्चीस सालों के दौरान पढऩे या नौकरी करने के लिए हजारों-लाखों लड़कियां छोटे शहरों से महानगरों में शिफ्ट कर रही हैं। ये प्रतियोगी परीक्षाएं भी दे रही हैं। अगर बात दिल्ली की करें तो यहां बिहार, झारखंड और ओडिशा की हजारों बेटियां हर साल आती हैं। ये यमुना पार के इलाकों में भी काफी संख्या में रहती हैं। आप कभी द्वारका से वैशाली जाने वाली मेट्रो रेल में सफर कीजिए। आप लक्ष्मी नगर और निर्माण विहार में मेट्रो रेल के हरेक फेरे में दर्जनों लड़कियों को चढ़ते-उतरते हुए देखेंगे। बैंगलुरू, चेन्नई और पुणो में भी देश भर से लड़कियां नौकरी के लिए पहुंच रही हैं। ये तीनों महानगर तो देश की आईटी राजधानी हैं ही। इसलिए वहां पर सारे देश के नौजवान भी जाते हैं। महानगरों में आते ही इन्हें एक नये संसार से साक्षात्कार होता है। इधर इनका कोई परिचित नहीं होता। ये लड़कियां आपस में एक साथ रहती हैं। इनके खाने-रहने की भी कोई ठोस व्यवस्था नहीं होती। इन परिस्थितियों में इनका शोषण करने वाले शातिर तत्व प्रकट हो जाते हैं।
दरअसल, घर के सुरक्षित माहौल से बाहर किसी शहर में जाकर जिंदगी को शुरू करना आसान नहीं होता। ये लड़कियां खतरनाक किस्म के तत्वों के निशाने पर रहती हैं। देखिए, नौकरी और शिक्षा के लिए लडक़े-लड़कियां

घर से तो निकलेंगी ही। उसे रोकना मुश्किल है। बेटियां भी पढ़-लिख कर आसमान छूने का तमन्ना रखती हैं। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है। बेहतर रोजगार तथा स्तरीय शिक्षा के अवसर तो बड़े शहरों तथा महानगरों में ही उपलब्ध हैं। इसलिए महानगरों में आने वाली लड़कियों को खास तौर पर सतर्क रहने की जरूरत है। महानगरों में करोड़ों की आबादी के बावजूद इंसान अकेला है। संकट में उसके साथ कोई नहीं होता। यहां पर नाच-गाने की पार्टयिों में लोग खुशी-खुशी आ जाते हैं पर अगर किसी पर  भगवान न करे, कोई संकट आ गया तो फिर लोग साथ खड़े नहीं होते।
सच्चाई यह है कि महानगरों के समाज का हिस्सा बनने में सालों लग जाते हैं। कुछ समय पहले राजधानी के एक शीर्ष पुलिस अफसर बता रहे थे कि उनके थाने में उन लडक़े-लड़कियों के झगड़े से जुड़े केस बहुत आते हैं, जो कई-कई महीनों से तो साथ-साथ रह रहे होते हैं। उसके बाद उनके तकरार और मारपीट शुरू हो जाती है। फिर मामला पुलिस के पास पहुंचता है। ये साथ-साथ रहने वाले लोग स्थानीय नहीं होते। ये दिल्ली के बाहर से आए होते हैं। कुल मिलाकर बात यह कि घर से बाहर पराए शहरों में नौकरी करने के लिए जाने वाली लड़कियों को आफताब तथा साहिल जैसे दरिंदों से बचना होगा। इन लड़कियों के माता-पिता, भाई-बहनों, सगे-संबंधियों को इनके संपर्क में प्रति दिन रहना होगा और संकट का आभास होते ही इनके पास तुरंत पहुंचना होगा। घर से संपर्क का तार टूटा कि लड़कियां राक्षसों के चंगुल में फंसीं।