March 20, 2026

भारतीय राजनीति में पक्ष-विपक्ष में बढ़ती दूरी


    गत 21 दिसम्बर को संसद का शीतकालीन सत्र अनिश्चत काल के लिए स्थगित हो गया । यह सत्र कई मायनों में उल्लेखनीय रहा है । इस सत्र में कई महत्वपूर्ण बिल पारित हो गये । दण्ड संहिता से सम्बन्धित आई.पी.सी., सी.आर.पी.सी. जैसे अंग्रेजों के काल से चले आ रहे तीन नये बिल लाये गये । गृहमंत्री ने कहा कि अंग्रेजों के बनाये ये कानून दण्ड देने के लिए थे । गुलाम मानसिकता से छुट्टी पा कर नये बिल न्याय देने के लिए हैं। अब दण्ड संहिता की पुरानी धाराओं के स्थान पर नयी धाराएं आ गई हैं । राजद्रोह की जगह इसे देशद्रोह किया गया है । इसी प्रकार मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति सम्बन्धी कमेटी की सदस्यता बदल दी गई है । अब मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक मंत्री सदस्य होगा। यानि प्रधानमंत्री, एक अन्य मंत्री और विपक्ष का लीडर । अब निश्चय ही मनचाहा व्यक्ति नियुक्त किया जा सकेगा । यूं पहले भी नियुक्त आयुक्त कुछ स्वतंत्र होकर कार्य करते नहीं दीखते थे । कुछ साल पहले एक आयुक्त ने प्रधानमंत्री की सभाओं पर अपना विमत दिया था जो सार्वजनिक नहीं होने दिया । यह भी आरोप है कि बाद में उस आयुक्त को, उसकी पत्नी, पुत्रों को शासन की एजेन्सियों द्वारा प्रताडि़त किया गया । यह बात दूसरी है कि शेसन के समय माहौल कुछ और था । अस्तु, मुख्य बात यह है कि ये सभी महत्वपूर्ण बिल बिना बहस के पारित हो गये क्योंकि लोकसभा और राज्यसभा के धीरे-धीरे दिन पर दिन 146 सदस्यों को निष्कासित कर दिया गया । इस बार संसद सचिवालय ने निलम्बित सदस्यों को लाबी, गैलरी व अपने कक्ष में जाने से भी वंचित कर दिया । मानों ये अब सांसद ही नहीं है । कानून वेक्ता कहते हैं यह आदेश सिरे से गलत है क्योंकि निष्कासन मात्र कार्यवाही में भाग न ले सकने को कहते हैं । जो भी हो संसदीय कार्य मंत्री की अनुशंसा के बाद राज्यसभा के सभापति या लोकसभा के अध्यक्ष ने इन 146 सदस्यों को शेष सत्र के लिए निष्कासित कर दिया । कुछ सदस्यों का मामला प्रिविलेज कमेटी को भी भेजा गया ।
  कुल मिलाकर यह स्थिति भारतीय राजनीति का काला पक्ष है क्योंकि पक्ष और विपक्ष दोनों के संयोग से संसदीय कार्य सम्पन्न होते हैं ।

अंग्रेज पत्रकार जो लंदन से छपने वाले ‘गार्जियन’ और ‘डेली टेलीग्राफ’ दैनिकों के लिए लिखते हैं और वे ब्रिटिश पार्लियामेंट को कवर करते हैं, बतलाते हैं कि वहां सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष की पार्टी के सदस्यों में परस्पर सौहार्द रहता है । संयुक्त क्रिकेट मैच होते हैं, साथ-साथ लंच होता है, साथ-साथ पिकनिक होती है और लेबर और कंजरवेटिव पार्टी के सदस्य एक ही कार में संसद में आते दिखलाई देते हैं । अब यह कहा जा सकता है कि यह तो गुलाम मानसिकता वाले देश का उदाहरण है, तो भारतीय उदाहरण में कुरुक्षेत्र युद्ध में पाण्डव शाम ढलते कौरवों के कैम्प में जाकर भीष्म पितामह के घावों में मलहम लगाते थे ।
  असल में दोनों पक्षों को आत्म चिंतन की जरूरत है । यदि राज्यसभा के सभापति की नकल उतारना गलत है तो प्रधान सेवक द्वारा राहुल गांधी की नकल उतारना भी गलत है। यह कहना भी गलत है कि “बरसाती पहनकर नहाना तो कोई डाक्टर साहब से पूछे” । यह कटाक्ष डॉ. मनमोहन सिंह के लिए था ।
    कोई भी राजनैतिक दल हो, उसके प्रवक्ता टी.वी. चैनलों में अन्य दलों को कोसते रहते हैं । इसके बात-बात में भाजपा या कांग्रेस या सपा या आप या टी.एम.सी. के प्रवक्ता किसी भी मुद्दे का मीडिया ट्रायल करते हैं । इस पर तो सर्वोच्च न्यायालय को रोक लगानी चाहिए क्योंकि अनेक बार न्यायालयों में लंबित केसों पर भी इनके द्वारा टिप्पणी करती देखी जा सकती है । स्वस्थ राजनीति में पक्ष और विपक्ष एक हैं । दोनों के सहयोग से प्रजातंत्र पुष्ट होगा !