भारतीय अर्थ व्यवस्था : अमीर और अमीर
साहसिक स्वीकारोक्ति, सच्चाई का सामना या सरकार को आईना दिखाना कहें, या कुछ और लेकर सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने जो कहा उसे सरकार के रुख के विपरीत तो कहा ही जा सकता है।
उन्होंने जो कहा उसका साफ-साफ अभिप्राय: यही है कि देश में गरीबों की संख्या बढ़ रही है, अमीर और अमीर होते जा रहे हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब संयुक्त राष्ट्र के हवाले से कुछ समय पहले कहा गया था कि देश में 33 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से ऊपर उठ चुके हैं। संघ और अपने गढ़ नागपुर में एक कार्यक्रम में गडकरी ने कहा कि धन का विकेंद्रीकरण जरूरी है। उन्होंने कृषि, विनिर्माण, कराधान और बुनियादी ढांचे के विकास में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) सहित कई मुद्दों पर बात की।
उनका इशारा अमीरों के धन पर शिंकजा ढीला करने की तरफ था। उनके अनुसार अर्थव्यवस्था को इस तरह से विकसित होना चाहिए कि रोजगार पैदा हों और ग्रामीण क्षेत्रों का उत्थान हो। उदार आर्थिक नीतियां अपनाने के लिए उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्रियों पीवी नरसिंह राव और मनमोहनंिसह की प्रशंसा की। उनके अनुसार ऐसे आर्थिक विकल्प पर विचार चल रहा है, जो रोजगार पैदा करेगा और अर्थव्यवस्था की वृद्धि को बढ़ावा देगा।
केंद्रीय मंत्री सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में क्षेत्रीय योगदान में असंतुलन से चिंतित दिखाई दिए। विनिर्माण क्षेत्र 22-24 फीसद, सेवा क्षेत्र 52-54 फीसद योगदान देता है, जबकि कृषि, ग्रामीण आबादी के 65-70 फीसद हिस्से को शामिल करने के बावजूद केवल 12 फीसद योगदान देती है। कृषि क्षेत्र का योगदान अर्थव्यवस्था में और अधिक होना चाहिए। चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (सीए) की पीठ ठोकते हुए केंद्रीय मंत्री ने उनमें अन्य क्षेत्रों में भी दखल बढ़ाने को कहा।
वे अर्थव्यवस्था के वृद्धि इंजन हो सकते हैं। आयकर रिटर्न दाखिल करने और जीएसटी जमा करने तक ही सीमित न रहें। गडकरी ने अपने मंत्रालय के काम का हवाला देते हुए कहा कि सड़क विकास के लिए धन की कमी नहीं है। मैं कहता हूं कि मेरे पास धन की कमी नहीं है, बल्कि मेरे पास काम की कमी है। उन्हें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि जनता से पैसा वसूल कर खजाना भरना ही योग्यता नहीं है। गरीबों की बढ़ती संख्या और चंद लोगों के अमीर होते जाने की स्थिति को बदलने की आवश्यकता है।
