March 8, 2026

शिक्षक दिवस पर बड़ा सवाल: गुरु से शिक्षक तक—क्या समाज का आइना धुंधला हो गया है?

स्पेशल रिपोर्ट : अर्जुन राणा

शिक्षक दिवस : बागेश्वर । यह दिन हर साल हमें डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की शिक्षाओं और आदर्शों को याद करने का अवसर देता है। लेकिन जब हम प्राचीन भारत की गुरुकुल परंपरा और आज की शिक्षा व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो यह साफ दिखाई देता है कि शिक्षा का स्वरूप, उद्देश्य और गुणवत्ता तेजी से बदल चुकी है। सवाल यह है कि आखिर गलती कहाँ है—शिक्षक में, सरकार में, या हमारी सोच में?

प्राचीन गुरु और शिक्षा की आत्मा

भारत की संस्कृति में गुरु को देवतुल्य माना गया है। तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों में शिक्षा केवल अक्षरज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि जीवन दर्शन, अनुशासन और चरित्र निर्माण का माध्यम थी। राजकुमार और साधारण किसान का बेटा एक ही आसन पर बैठकर समान शिक्षा पाता था। न धन का भेद था, न ऊँच-नीच का। यही भारतीय शिक्षा का स्वर्णकाल था।

आज का शिक्षक और बदलती तस्वीर

आधुनिक दौर में शिक्षा ने व्यवसाय का रूप ले लिया है। शिक्षक अब अंकों और परीक्षाओं तक सीमित होते जा रहे हैं। कई बार अमीर और गरीब विद्यार्थियों के बीच अदृश्य दीवार खड़ी कर दी जाती है। प्रेरणा देने की बजाय शिक्षक खुद दबाव और पूर्वाग्रह में जीने लगते हैं। सवाल यह है कि क्या आज का शिक्षक समाज का आइना है, या उस दर्पण की तरह जो धुंधली तस्वीर दिखाता है?

असमानता की खाई

निजी विद्यालयों की चकाचौंध और सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा के बीच शिक्षा का वास्तविक स्वरूप खो गया है। एक ओर अमीर बच्चों के लिए एसी क्लासरूम और डिजिटल लैब हैं, वहीं दूसरी ओर गरीब बच्चों के लिए टूटी डेस्क और जर्जर इमारतें। इस अंतर ने शिक्षा के उद्देश्य को गहराई से प्रभावित किया है।

लालफीताशाही की मार

हमारी शिक्षा व्यवस्था लालफीताशाही की जकड़ में फँसी है। योजनाएँ बनती हैं, बजट आता है, घोषणाएँ होती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका असर कहीं दिखाई नहीं देता। फाइलें मंत्रालयों और दफ्तरों में सालों तक धूल खाती रहती हैं। परिणाम यह होता है कि बच्चों तक वह बदलाव कभी पहुँच ही नहीं पाता जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है।

अगर अफसरों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते…

सोचिए, यदि हमारे बड़े अफसरों, नेताओं और नीति-निर्माताओं के बच्चे भी आम गरीब बच्चों के साथ सरकारी स्कूलों में पढ़ते तो तस्वीर कितनी बदल जाती। तब वही व्यवस्था, जिसे वे अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, उनकी प्राथमिकता बन जाती। स्कूलों में किताबें समय पर पहुँचतीं, अध्यापक पूरे मन से पढ़ाते, और सुविधाओं की कमी कभी मुद्दा ही न बनती। लेकिन हकीकत यह है कि नीति बनाने वाले अपने बच्चों को निजी विद्यालयों और विदेश भेजते हैं, जबकि आम जनता को सरकारी स्कूलों के भरोसे छोड़ देते हैं।

शिक्षा क्यों नहीं दिखती सच के धरातल पर

आज हमारी शिक्षा व्यवस्था सच के धरातल पर इसलिए नज़र नहीं आती क्योंकि उसका मूल उद्देश्य बदल गया है। प्राचीन काल में शिक्षा समाज निर्माण का माध्यम थी, जबकि आज यह केवल नौकरी और पैसे कमाने का साधन बन चुकी है। शिक्षक दबाव में पढ़ाते हैं, सरकार योजनाएँ बनाकर भूल जाती है और नई पीढ़ी शिक्षा को केवल कैरियर तक सीमित कर देती है।

प्रेरणा और उम्मीद

फिर भी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। देश के कोने-कोने में ऐसे शिक्षक आज भी हैं जो बिना संसाधनों के भी बच्चों को प्रेरणा दे रहे हैं। गाँव के मास्टर जी, जो पेड़ की छाँव में बैठाकर बच्चों को पढ़ाते हैं, या वह अध्यापिका, जो अपने तनख्वाह का हिस्सा बच्चों की किताबों पर खर्च कर देती है—यही हमारी उम्मीद की किरण हैं। ये गुरु ही समाज के असली आइने हैं।

निष्कर्ष: जिम्मेदारी सबकी

अब सवाल यह है कि दोष किसका है—क्या यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की चूक है, हमारी सरकार की नाकामी है या हमारी नई पीढ़ी की लापरवाही? सच्चाई यही है कि दोष सबका है। जब तक शिक्षक अपने आचरण से प्रेरणा नहीं देंगे, सरकार ईमानदारी से नीतियों को लागू नहीं करेगी और नई पीढ़ी शिक्षा को जीवन दर्शन की तरह नहीं अपनाएगी, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा।

शिक्षक दिवस का संदेश यही है कि गुरु-शिष्य संबंध केवल ज्ञान का नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने का है। जब शिक्षक सचमुच समाज का आइना बनेंगे और सभी वर्गों के बच्चों को समान शिक्षा मिलेगी, तभी शिक्षा व्यवस्था जीवंत मिशाल बन पाएगी।