March 19, 2026

गाँवों की कानून व्यवस्था चरमराई, राजस्व पुलिस व्यवस्था पर सवाल – कोर्ट के आदेशों के बावजूद धामी सरकार नाकाम

अर्जुन राणा

गरुड़ (बागेश्वर)। उत्तराखंड में 157 साल पुरानी राजस्व पुलिस व्यवस्था को खत्म कर गाँवों को नियमित (रेगुलर) पुलिस व्यवस्था के हवाले करने का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। उच्च न्यायालय ने पहले ही वर्ष 2018 में आदेश दिया था कि छह माह के भीतर राज्य में राजस्व पुलिसिंग प्रणाली को समाप्त कर अपराधों की जांच सिविल पुलिस के हवाले की जाए। इसके बावजूद आज तक अधिकांश गाँव राजस्व पुलिस व्यवस्था में ही फंसे हुए हैं।

राज्य सरकार द्वारा अदालत में दाखिल हलफनामे में यह माना गया था कि राज्य की आबादी एक करोड़ से अधिक है जबकि थानों की संख्या केवल 156 है, जो बेहद कम है। प्रति 64 हजार की आबादी पर मात्र एक पुलिस स्टेशन होना कानून व्यवस्था के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट भी पहले ही कह चुका है कि राजस्व पुलिस को सिविल पुलिस की तरह प्रशिक्षित नहीं किया जाता, उनके पास डीएनए, रक्त परीक्षण, फॉरेंसिक, फिंगरप्रिंट जैसी आधुनिक जांच सुविधाएं नहीं हैं, जिससे अपराध की गहराई से जांच करना संभव नहीं हो पाता।

इधर, 27 मई 2024 को आर्म्स प्रभारी अधिकारी की रिपोर्ट में बताया गया कि बागेश्वर जिले की तहसील बागेश्वर, गरुड़, काफलीगैर और दुगनाकुरी के अंतर्गत 171 राजस्व ग्रामों को नियमित पुलिस क्षेत्रों में शामिल किए जाने का प्रस्ताव आयुक्त एवं राजस्व परिषद, उत्तराखंड को भेजा जा चुका है।

लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि गाँवों में अब भी कानून व्यवस्था डगमगाने लगी है। आए दिन असामाजिक तत्व शराब पीकर रातभर लोगों का जीना हराम कर रहे हैं। बीती रात एक शराबी ने इस आखरीआंख के पत्रकार अर्जुन राणा को गाली-गलौज और मारपीट की धमकी दी।

कोर्ट के आदेश के बाद राजस्व उपनिरीक्षक आंदोलन पर हैं और उन्होंने पुलिस संबंधित कार्य बंद कर दिए हैं। ऐसे में नायब तहसीलदारों के जिम्मे 80–90 गाँवों की जिम्मेदारी है, जो किसी भी तरह सम्भव नहीं लगती।

क्षेत्र के अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधि अब धामी सरकार से मांग कर रहे हैं कि तुरंत बचे हुए गाँवों को रेगुलर पुलिस के हवाले किया जाए। उनका कहना है कि ग्रामीण कानून व्यवस्था को किसी भी हाल में राम भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।