बिहार देश की सामाजिक न्याय और जाति व्यवस्था की प्रयोगशाला
( बिहार विधानसभा चुनावों पर विशेष)
वैशाली, भगवान बुद्ध, नालंदा विश्वविद्यालय, माता सीता की मढ़ी ,सरीखे गौरवशाली इतिहास को समेटे भारत का पौराणिक कथाओं से भरपूर राज्य बिहार देश की जाति व्यवस्था और सामाजिक न्याय की प्रयोगशाला है। ब्रिटिश ने बंगाल के विभाजन के बाद 1911 में इसे स्थापित किया । मध्यकालीन भारत में बिहार में नालंदा विश्वविद्यालय था जिसमें चीनी यात्री हैन संग के मुताबिक दस लाख पांडुलीपि थी जिनको 13 बी सदी में अलाउद्दीन खिलजी ने जलाकर नष्ट कर दिया था ।इन पांडुलीपि में प्राचीन भारत का इतिहास दर्ज था ।उससे पहले ईसा पूर्व 567 में भगवान बुद्ध को परम ज्ञान की अनुमति हुई थी।गंगा, कोसी, ब्रह्मपुत्र नदी
के तीर में बसा बिहार आजादी के आंदोलनों का साक्षी रहा है। आजादी के बाद भारत में अगर जाति व्यवस्था को सामाजिक न्याय में बदला गया तो वह बिहार ही है । लीची, मखानों, आम, धान, उड़द, ग्वार, मूंगफली,गेहूं आलू का उत्पादन के लिए विख्यात बिहार में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज रही है।
243 सदस्यीय बिहार विधानसभा का चुनाव 6 और 11 नवंबर होना है। राजनीतिक प्रवेक्षकों की माने तो जातियों के समूह तय करेंगे कि कौन सरकार बनाएगा। मुख्य मुकाबला बीजेपी, जेडीयू गठजोड़ यानि एनडीए और राजद कांग्रेस के महागठबंधन के बीच है।
राजद ने यादव मुस्लिम जातियों को आकर्षित कर रखा है
तो नीतीश कुमार ने अति पिछड़ी जातियों जैसे कोली, कुशवाह, निषाद, कुर्मी,धोबी,तथा अनुसूचित जातियों जैसे पासवान, धानुक, डिमरी, धाम,को अपना लक्ष्य बनाया है
भारतीय जनता पार्टी ब्राह्मण, क्षत्रिय, बनिया,भूमिहार,पर नजर रखे है। कांग्रेस राजद के साथ है और 61 सीट पर चुनाव लड़ रही है जबकि राजद 127 सीट पर चुनाव में है।
हृष्ठ्र में बीजेपी जेडीयू 101 ,101 पर मैदान में हैं। चिराग पासवान की पार्टी 29, जीतन राम मांझी 6 पर लड़ रहे हैं।
पूरा चुनाव अभियान सभी पार्टियों का जाति व्यवस्था के आधार पर चल रहा है। अन्य राज्यों में जब चुनाव होते हैं तो विकास, क्षेत्र, भाषा, बोली मुद्दे होते हैं लेकिन बिहार में यह सब मुद्दे नदारत हैं। हां एक महिला सशक्तिकरण जरूर भारतीय जनता पार्टी ने मुद्दा बनाया है।
राजद नेता तेजस्वी यादव पूरे बिहार में घूम घूम कर यादव मुस्लिम का मजबूत स्थान दे रहे हैं।
बिहार में 1952 प्रथम चुनाव से ही जाति गत राजनीत होती रही है। इसका कारण यह है कि ब्रिटिश राज्य में और उससे पहले मुस्लिम एरा में बड़ी जातियों ने छोटी जातियों का बहुत शोषण किया। जिसमें मंदिरों में प्रवेश, आवाज निकालकर निकलना, बेगारी, दासता, दैहिक शोषणों, महिलाओं की स्थिति, भयानक अशिक्षा, अंधविश्वास, जमींदारी प्रथा, जैसी समस्याओं से बिहार अभिशप्त रहा था। मुसलमानों के शासन में यही व्यवस्था बनी रही हालांकि ब्रिटिश ने कुछ सुधार किए मगर वे मन से और बहुत कम ।
इन परिस्थितियों के चलते पूरे निचले तबके में ऊंची जातियों के प्रति आक्रोश पनप रहा था और जब आजादी के बाद मताधिकार मिला तो वह गुस्सा फूट पड़ता है।यही जाति व्यवस्था है।
हालांकि सरकारी स्तर पर नौकरियों में आरक्षण मिला है लेकिन इस पर भी उन्हीं लोगों ने अपने लोग बिठा लिए जो शोषक थे।सबसे पहले रामधन, बाबू जगजीवन राम, कर्पूरी ठाकुर आदि नेताओं ने सामाजिक न्याय की आवाज उठाई और जाति आधारित राजनीति शुरू की।बिहार में एक समय तो जातिगत सेनाएं बन गई थीं और उन्होंने सामूहिक हत्याएं और कत्लेआम मचाया। जिसमें रणवीर सेना, कुश सेना,आदि ने लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री के समय तबाही मचाई।
बिहार में दासता की कहानी पुरानी है ब्रिटिश राज्य में चंपारण जिले के किसानों को 15 फीसदी अपनी खेती की
नील की खेती ब्रिटिश के कहने पर करनी पड़ती थी और यह प्रत्येक किसान के लिए अनिवार्य था।जिससे किसान बीमार हो रहे थे।यह एक तरह की बेगारी थी ।एक रामकिशोर शुक्ल नामक स्वतंत्रता सेनानी ने महात्मा गांधी को यह बात बताई तब महात्मा गांधी ने 15 अप्रैल 1917 को चंपारण में सत्याग्रह किया।जो इतिहास में दर्ज है। इस आंदोलन से गांधी जी स्थापित हुए । कहने का मतलब यह है कि ब्रिटिश राज्य में भी बेगारी बिहार में बहुत चलती थी। सुप्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत राय ने आजादी के बाद सत्तर के दशक में बिहार में विद्यमान जातिगत कुरीतियों और महिलाओं, स्त्रियां,के शोषण, चक्र,आक्रोश, मृगया,तृष्णा,आदि फिल्में बनाई जो बिहार की परिस्थितियों को इंगित करती थी।
महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की वैशाली की बधू भी इन्हीं व्यवस्था पर आधारित थी। ब्रिटिश राज्य में किसानों का शोषण जमींदारों भी किया
