January 29, 2026

नेहरू बनाम मोदी: विदेश नीति की कसौटी और जनता की स्वीकार्यता का कठोर सच


इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में सबसे निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या नेहरू की विदेश नीति अधिक दूरदर्शी थी या आज की मोदी-कालीन विदेश नीति अधिक प्रभावी है? नेहरू की विदेश नीति को यदि उसके समय, परिस्थितियों और सामर्थ्य के आलोक में देखा जाए, तो वह नैतिकता, आत्मसम्मान और दीर्घकालिक दृष्टि की मिसाल प्रतीत होती है। गुटनिरपेक्षता कोई कायरता नहीं थी, बल्कि यह भारत की सभ्यतागत चेतना का राजनीतिक अनुवाद थी—एक ऐसा भारत जो किसी भी महाशक्ति के आगे झुकने के बजाय संवाद, संतुलन और नैतिक दबाव के जरिए अपनी बात रखता था। नेहरू ने सीमित संसाधनों के बावजूद भारत को विश्व मंच पर एक नैतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया, जिसकी बात सुनी जाती थी, भले ही उसकी सैन्य या आर्थिक ताकत सीमित हो।
इसके उलट, मोदी युग की विदेश नीति प्रचार, छवि और व्यक्तिगत कूटनीति के इर्द-गिर्द अधिक केंद्रित दिखाई देती है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भव्य स्वागत, प्रवासी सम्मेलनों की गूँज और “विश्वगुरु” की अवधारणा ने एक आभासी आत्मविश्वास तो रचा, परंतु आज जब ट्रंप खुलेआम भारत पर टैरिफ़ थोप रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध अनाप-शनाप बयान दे रहे हैं, तब यह चमक फीकी पड़ती दिखती है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इन सार्वजनिक अपमानजनक बयानों के बावजूद भारत की ओर से कोई स्पष्ट, दृढ़ और सार्वजनिक प्रतिवाद सामने नहीं आता। यह मौन कूटनीति नहीं, बल्कि रणनीतिक असहजता का संकेत अधिक लगता है।
यही वह बिंदु है जहाँ जनता का धैर्य और समझ परीक्षा में पड़ती है। प्रश्न यह नहीं है कि भारत को अमेरिका से टकराव चाहिए या नहीं, प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी विदेश नीति में आत्मसम्मान का वही स्तर बनाए रख पा रहा है, जिसकी परिकल्पना नेहरू ने की थी? आज की भारतीय जनता, जो राष्ट्रवाद और स्वाभिमान के नारों से परिचित कराई गई है, क्या वह यह दृश्य सहजता से पचा पा रही है कि एक विदेशी नेता भारत पर आर्थिक दंड लगाए और देश का नेतृत्व संयम के नाम पर मौन साधे रहे? उत्तर स्पष्ट नहीं, परंतु असंतोष की अंतर्धारा साफ दिखाई देती है।
निष्कर्षतः, नेहरू और मोदी की विदेश नीतियों की तुलना किसी एक को पूर्णतः सही और दूसरे को पूर्णतः गलत ठहराने का प्रश्न नहीं है। किंतु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि नेहरू की विदेश नीति ने भारत को कभी सार्वजनिक रूप से असहाय नहीं दिखने दिया, जबकि आज की विदेश नीति में वह जोखिम स्पष्ट रूप से मौजूद है। जनता आज यह महसूस कर रही है कि भव्य मंचों और शक्तिशाली मित्रताओं के दावों के बावजूद, जब वास्तविक परीक्षा आती है, तो भारत की आवाज़ अपेक्षाकृत धीमी पड़ जाती है। शायद यही वह क्षण है, जहाँ देश को फिर से यह तय करना होगा कि विदेश नीति केवल छवि का उत्सव होगी या आत्मसम्मान की अडिग साधना।