January 29, 2026

सरयू बगड़ में कुली बेगार आंदोलन की हुंकार

अर्जुन राणा


उत्तरायणी पर्व केवल एक धार्मिक–सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड के जनमानस में स्वतंत्रता, स्वाभिमान और प्रतिरोध की जीवंत स्मृति है। बागेश्वर जनपद के ऐतिहासिक सरयू बगड़ में घटित कुली बेगार आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन स्वर्णिम अध्यायों में से एक है, जहाँ साधारण पहाड़ी जन ने असाधारण साहस का परिचय देते हुए ब्रिटिश साम्राज्य की दमनकारी नीतियों को खुली चुनौती दी।
ब्रिटिश शासन के दौरान कुमाऊँ क्षेत्र में “कुली बेगार” जैसी अमानवीय प्रथा लागू थी, जिसके अंतर्गत स्थानीय ग्रामीणों को जबरन अंग्रेज अधिकारियों का सामान ढोने, लंबी यात्राओं में सेवा देने और कठिन श्रम करने को विवश किया जाता था। यह श्रम न केवल बिना पारिश्रमिक के होता था, बल्कि इसके साथ अपमान, शोषण और भय का वातावरण भी जुड़ा रहता था। यह व्यवस्था पहाड़ी समाज की आत्मा को आहत कर रही थी और भीतर ही भीतर प्रतिरोध की आग सुलगा रही थी।
14 जनवरी 1921 को उत्तरायणी पर्व के पावन अवसर पर यह दबी हुई पीड़ा एक संगठित जनआंदोलन का रूप लेकर सरयू बगड़ में फूट पड़ी। दूर–दराज़ के गाँवों से हज़ारों की संख्या में लोग एकत्र हुए। नेतृत्व कर रहे थे उस युग के प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक और समाज सुधारक—बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत, चिरंजीलाल और अन्य जागरूक जननायक। इस ऐतिहासिक सभा में जनता ने सामूहिक रूप से यह संकल्प लिया कि वे अब किसी भी प्रकार की कुली बेगार नहीं करेंगे।
आंदोलन का सबसे प्रतीकात्मक और क्रांतिकारी क्षण वह था, जब लोगों ने अपने “कुली रजिस्टर” और पहचान पत्र सरयू नदी में प्रवाहित कर दिए। यह केवल काग़ज़ों का बहाव नहीं था, बल्कि गुलामी की मानसिकता, भय और अंग्रेजी दासता के विरुद्ध एक स्पष्ट घोषणा थी। बिना हथियार, बिना हिंसा—केवल जनसंकल्प और एकता के बल पर पहाड़ी समाज ने यह सिद्ध कर दिया कि सत्ता की नींव जनता की सहमति पर ही टिकी होती है।
सरयू बगड़ का यह आंदोलन अंग्रेजी प्रशासन के लिए अप्रत्याशित था। व्यापक जनदबाव और आंदोलन की नैतिक शक्ति के सामने अंततः ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और कुमाऊँ क्षेत्र में कुली बेगार प्रथा समाप्त करनी पड़ी। यह सफलता केवल एक स्थानीय विजय नहीं थी, बल्कि इसने समूचे उत्तराखण्ड में राजनीतिक चेतना और आत्मसम्मान की नई लहर पैदा की।
आज जब उत्तरायणी का पर्व मनाया जाता है, तब सरयू बगड़ केवल एक भौगोलिक स्थल नहीं रह जाता, बल्कि वह स्वतंत्रता, संघर्ष और जनशक्ति का तीर्थ बन जाता है। यहाँ की धरती आज भी उन स्वरों को सहेजे हुए है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को ललकारा था। कुली बेगार आंदोलन हमें यह स्मरण कराता है कि इतिहास केवल राजाओं और शासकों से नहीं बनता, बल्कि साधारण जनता के असाधारण साहस से रचा जाता है।
उत्तरायणी के पावन अवसर पर सरयू बगड़ में उठी वह हुंकार आज भी उत्तराखण्ड की चेतना में गूंजती है—यह बताने के लिए कि जब जन जागता है, तो अन्याय की सबसे मजबूत जंजीरें भी टूट जाती हैं।

यही कारण है कि आज भी उसी सरयू बगड़ में सभी राजनैतिक दल अपना पंडाल डालकर जनता को उस ऐतिहासिक दिन की याद प्रतिवर्ष दिलाते रहते है।