January 29, 2026

संवैधानिक व्यवस्था दायरे में नहीं


कोलकाता की घटना संघीय ढांचे के चरमराने का संकेत है। संबंधित पक्ष ऐसे विवादों से सड़कों पर निपटने लगें, तो उसका अर्थ है कि बात संवैधानिक व्यवस्था के दायरे में नहीं रह गई है। आखिर इस तरह की नौबत क्यों आई?
कोलकाता में आई-पैक के दफ्तर पर प्रवर्तन निदेशालय के छापे का मुकाबला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सड़क पर उतर कर किया। ऐसा शायद पहली बार हुआ, जब एक केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई के बीच किसी मुख्यमंत्री ने इस तरह का दखल दिया हो। उस घटना के बाद से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने इसको लेकर एक बड़ा राजनीतिक अभियान छेड़ रखा है। उधर ईडी ने सुप्रीम कोर्ट की पनाह ली है। ईडी का इल्जाम है कि आई-पैक एजेंसी से जुड़े व्यक्तियों ने हवाला के जरिए अवैध रूप से धन का लेन-देन किया है। जबकि तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि चूंकि आई-पैक को उसने अपने विधानसभा चुनाव अभियान के प्रबंधन का ठेका दिया है और इसलिए उसके पास पार्टी की रणनीति संबंधी आंकड़े हैं, तो उन्हें ही चुराने ईडी वहां गई थी।
तृणमूल की शिकायत पर कोलकाता पुलिस ने दस्तावेजों की चोरी का केस दर्ज किया है। उसने उन ईडी तथा केंद्रीय शस्त्र बल के कर्मियों की पहचान शुरू कर दी है, जो आई-पैक के दफ्तर पर गए। तो इस रूप में ये मामला केंद्र और राज्य सरकारों के बीच टकराव में तब्दील हो गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि तृणमूल ने अपनी शिकायत को बयानों या कानूनी चुनौती तक सीमित नहीं रखा। उसकी नेता एवं मुख्यमंत्री ने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से ईडी के छापे में रुकावट डाली। यह घटना देश के संघीय ढांचे के चरमराने का संकेत है।
संबंधित पक्ष ऐसे विवादों से सड़कों पर निपटने लगें, तो उसका अर्थ है कि बात संवैधानिक व्यवस्था के दायरे में नहीं रह गई है। यह गंभीर विचार-विमर्श का विषय है कि ये नौबत क्यों आई? साफ वजह राजनीतिक वर्ग में आपसी भरोसे का टूट जाना है। विपक्षी खेमों में आम धारणा है कि केंद्रीय एजेंसियां सत्ताधारी भाजपा के सियासी मकसद को साधने का औजार बन गई हैं। इस दौर में कानूनों की व्याख्या के क्रम में न्यायपालिका ने भी राजनीतिक परिदृश्य की अनदेखी कर तकनीकी नजरिया अपना रखा है। ऐसे में तृणमूल को सड़क पर मुकाबला करना मुफीद महसूस हुआ होगा। लेकिन लोकतंत्र एवं संघीय व्यवस्था के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है।