इंदिरा अम्मा कैंटीनों का बंद होना सामाजिक संवेदना की हार है: पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत
देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य में इंदिरा अम्मा कैंटीनों के लगातार बंद होने पर गहरा दुःख और चिंता व्यक्त करते हुए इसे गरीब, श्रमिक और असंगठित क्षेत्र के लोगों के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व से विमुख होने का प्रतीक बताया है। उन्होंने कहा कि यह योजना केवल भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि सम्मान, पोषण और मानवीय गरिमा की एक सशक्त अभिव्यक्ति थी, जिसे धीरे-धीरे समाप्त किया जाना अत्यंत पीड़ादायक है।
हरीश रावत ने कहा कि इंदिरा अम्मा कैंटीनों की परिकल्पना इस सोच के साथ की गई थी कि शहरी क्षेत्रों में रहने वाले गरीब, दिहाड़ी मजदूर, गिग वर्कर और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक—चाहे वे साधारण वेश में हों या औपचारिक परिधान में—सभी को सस्ती दरों पर पौष्टिक और सम्मानजनक भोजन मिल सके। इन कैंटीनों के माध्यम से उत्तराखंड के पारंपरिक, जैविक और मोटे अनाजों जैसे मडुआ, झंगोरा और उनके सहोदर अन्न को आम जनजीवन से जोड़ा गया, जिन्हें आज देश ‘श्रीअन्न’ के नाम से पहचान रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने स्मरण कराया कि उनकी सरकार का उद्देश्य केवल पेट भरना नहीं था, बल्कि उत्तराखंड की धरती के अनाज को सम्मान देना, स्थानीय किसानों को प्रोत्साहन देना और झंगोरे की खीर जैसे पारंपरिक व्यंजनों को राष्ट्रीय व्यंजन संस्कृति का हिस्सा बनाना था। उन्होंने कहा कि लाखों लोगों ने इन कैंटीनों का लाभ उठाया और यह योजना सामाजिक न्याय की दिशा में एक ठोस कदम थी।
हरीश रावत ने यह भी कहा कि उनकी सरकार के कार्यकाल में पोषण को एक व्यापक अभियान के रूप में देखा गया। वृद्ध महिला पोषण आहार योजना, गर्भवती महिला पोषण योजना, बाल पोषण कार्यक्रम और टेक होम राशन जैसी योजनाओं के माध्यम से महिला स्वयं सहायता समूहों और आंगनबाड़ियों को आर्थिक सशक्तिकरण से जोड़ा गया। यह केवल कल्याण नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में एक गंभीर प्रयास था।
उन्होंने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि अन्न सुरक्षा के दायरे से बाहर रह गए एपीएल कार्डधारकों के लिए सस्ती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने और देश की पहली सार्वभौम स्वास्थ्य बीमा योजना उत्तराखंड में लागू करने जैसी पहलों को भी उसी सामाजिक दृष्टि से शुरू किया गया था। गंभीर बीमारियों से पीड़ित बच्चों तक के इलाज का पूरा खर्च राज्य द्वारा वहन किया जाना मानवीय शासन का उदाहरण था।
इंदिरा अम्मा कैंटीनों की वर्तमान दुर्दशा पर चिंता जताते हुए हरीश रावत ने कहा कि वे रोज लोगों से इन कैंटीनों के बंद होने की खबरें सुनते हैं, जो उन्हें भीतर तक व्यथित करती हैं। उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि उत्तरायणी के बाद 20 जनवरी को वे किसी बंद हो चुकी इंदिरा अम्मा कैंटीन पर लोगों को ‘इंदिरा खिचड़ी’ खिलाकर अपनी ओर से उसे श्रद्धांजलि देंगे, ताकि इस सामाजिक प्रयोग की स्मृति जीवित रह सके।
पूर्व मुख्यमंत्री ने अंत में कहा कि इंदिरा अम्मा कैंटीनों का बंद होना केवल एक योजना का अंत नहीं, बल्कि उस संवेदनशील सोच का क्षरण है, जिसमें शासन का उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्मान और पोषण पहुँचाना होता है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में राज्य की नीतियाँ फिर उसी मानवीय दृष्टिकोण की ओर लौटेंगी।
