January 30, 2026

गरुड़ में गैस कनेक्शन या व्यवस्था का मज़ाक?—केवाईसी के नाम पर उपभोक्ता से प्रपंच और “फर्जी डिलीवरी” का खेल


गरुड, बागेश्वर । सरकारी उपक्रम इंडियन ऑयल के अंतर्गत संचालित इंडेन गैस सेवा, जो आम नागरिक की रसोई से सीधे जुड़ी हुई है, आज अपनी कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। मामला उस उपभोक्ता से जुड़ा है जिसे दिसंबर माह में यह कहकर गैस सिलेंडर देने से मना कर दिया गया कि उसका केवाईसी पूर्ण नहीं है, जबकि उसी उपभोक्ता के मोबाइल फोन पर यह संदेश लगातार प्राप्त हो रहा है कि उसका सिलेंडर सफलतापूर्वक “डिलीवर” कर दिया गया है। यह विरोधाभास न केवल व्यवस्था की लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों के खुले उल्लंघन की ओर भी इशारा करता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब उपभोक्ता ने इस कथित डिलीवरी के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए डिलीवरी क्लर्क से बार-बार संपर्क साधा, तो उसे पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया। न कोई स्पष्ट जवाब, न कोई आधिकारिक सूचना—मानो उपभोक्ता सवाल पूछने का अधिकार ही न रखता हो। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जिस सिलेंडर की डिलीवरी दर्शाई जा रही है, वह आखिर किसे दी गई? यदि उपभोक्ता को गैस नहीं मिली, तो सिस्टम में डिलीवरी दर्ज कैसे हो गई?

क्षेत्रीय उपभोक्ताओ का यह भी आरोप हैं कि उन्हें कभी भी गैस सिलेंडर को तौलकर नही दिया जाता है। और कभी 2 तो उन्हें आधा ही सिलेंडर दिया जाता है। जिसका की एकबार का भुक्तभोगी खुद यह पत्रकार रहा है। जनता की यह भी पुरजोर मांग हैं कि उन्हें हरबार उनका सिलेंडर तौलकर ही दिया जाए जिसका की वे पैसा अदा करते है!!?
यह स्थिति केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है, बल्कि उन हजारों उपभोक्ताओं की पीड़ा का प्रतीक है जो सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की उम्मीद करते हैं। केवाईसी के नाम पर गैस रोक देना और दूसरी ओर डिलीवरी का झूठा संदेश भेज देना—यह न सिर्फ प्रशासनिक अव्यवस्था है, बल्कि संभावित भ्रष्टाचार और रिकॉर्ड में हेरफेर की आशंका को भी जन्म देता है।
गैस गोदाम और उससे जुड़े कर्मचारियों का यह रवैया इस सवाल को मजबूती से खड़ा करता है कि क्या वे स्वयं को सर्वेसर्वा समझ बैठे हैं? क्या एक आम उपभोक्ता को जवाब देना उनकी जिम्मेदारी नहीं है? सरकारी सेवा का अर्थ उपकार नहीं, बल्कि कर्तव्य होता है—और जब यही कर्तव्य अहंकार और लापरवाही की भेंट चढ़ जाए, तो उसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ता है।
जनहित में यह आवश्यक है कि संबंधित गैस एजेंसी, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन और जिला प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए। यह स्पष्ट किया जाए कि दिसंबर माह में दर्शाई गई डिलीवरी वास्तव में किसके नाम पर और किसे दी गई। साथ ही, दोषी कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में कोई भी उपभोक्ता इस प्रकार की मानसिक, आर्थिक और घरेलू परेशानी का शिकार न हो।
यह खबर केवल शिकायत नहीं, बल्कि चेतावनी है—कि यदि अब भी व्यवस्था नहीं चेती, तो जनता सवाल पूछना जानती है और अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना भी।

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