February 11, 2026

महंगी पड़ेगी ट्रंप की दोस्ती, रूस से तेल न खरीदने की शर्त से भारत में बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम


न्यूयॉर्क । भारत और अमेरिका के बीच इन दिनों जिस ट्रेड डील की चर्चा जोरों पर है, उसकी एक भारी कीमत देश के आम आदमी को चुकानी पड़ सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी मशहूर ‘अमेरिका फर्स्टÓ नीति के तहत भारत के सामने एक बेहद सख्त शर्त रख दी है। शर्त एकदम सीधी है कि भारत को रूस से तेल खरीदना तुरंत बंद करना होगा और इसके बदले अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका और वेनेजुएला पर निर्भर होना पड़ेगा। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि अगर भारत ऐसा नहीं करता है, तो उसे फिर से 25 फीसदी टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है। इस कूटनीतिक दबाव के बीच सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि अगर भारत अमेरिका की यह बात मान लेता है, तो देश में पेट्रोल-डीजल के दाम किस हद तक बढ़ेंगे।
रूस से नाता तोड़ना नहीं है आसान
भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का करीब 85 फीसदी हिस्सा विदेशों से आयात करता है और पिछले कुछ सालों में रूस भारत के लिए सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। आंकड़े बताते हैं कि भारत के कुल तेल आयात का लगभग एक तिहाई हिस्सा अकेले रूस से आ रहा था। जानकारों का मानना है कि रूस से तेल की खरीदारी को पूरी तरह बंद करना भारत के लिए लोहे के चने चबाने जैसा होगा, हालांकि दबाव के चलते इसमें कटौती शुरू हो चुकी है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरी कंपनियों पर इसका असर दिखना शुरू भी हो गया है। इंडियन ऑयल (ढ्ढह्रष्ट) और एचपीसीएल (॥क्कष्टरु) जैसी सरकारी कंपनियों ने अब वेनेजुएला की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। वहीं, निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने रूस से तेल की खरीद रोक दी है और वेनेजुएला से एक बड़ी खेप का ऑर्डर दिया है।
अमेरिकी और रूसी तेल में है बड़ा तकनीकी अंतर
यह मामला सिर्फ राजनीति का नहीं, बल्कि रिफाइनरी के विज्ञान और रसायन (ष्टद्धद्गद्वद्बह्यह्लह्म्4) का भी है। रूस के नेशनल एनर्जी सिक्योरिटी फंड के विशेषज्ञों का कहना है कि तेल के सप्लायर को बदलना इतना आसान नहीं है। तकनीकी पेंच यह है कि अमेरिका जो ‘शेल ऑयलÓ बेचता है, वह काफी हल्का होता है और उसे ‘गैस कंडेनसेटÓ की श्रेणी में रखा जाता है। इसके ठीक उलट, रूस का ‘यूराल क्रूडÓ भारी होता है और उसमें सल्फर की मात्रा अधिक होती है। समस्या यह है कि भारत की कई रिफाइनरियां इसी भारी और सल्फर युक्त रूसी तेल को प्रोसेस करने के लिए विशेष रूप से डिजाइन की गई हैं। अगर भारत को अमेरिकी तेल का इस्तेमाल करना है, तो उसे भारी खर्च करके इसे अन्य ग्रेड के तेलों के साथ मिलाना (क्चद्यद्गठ्ठस्र) पड़ेगा। यानी एक तेल की जगह दूसरे को रातों-रात रिप्लेस करना तकनीकी रूप से जटिल और एक महंगा सौदा साबित होगा।
आपकी जेब पर पड़ेगा सीधा असर
आर्थिक गणित को समझें तो रूस भारत को तेल पर भारी डिस्काउंट देता रहा है। पहले यह छूट 7 से 8 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब बढ़कर 11 डॉलर तक हो गई है। यानी रूस से तेल खरीदना भारत के लिए बेहद फायदे का सौदा है। दूसरी ओर, वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी कच्चा तेल भारतीय खरीदारों के लिए काफी महंगा साबित होगा। वोर्टेक्सा (ङ्कशह्म्ह्लद्ग&ड्ड) के विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर भारतीय रिफाइनरियां रूसी तेल छोड़कर अमेरिकी तेल अपनाती हैं, तो उन्हें प्रति बैरल कम से कम 7 डॉलर ज्यादा खर्च करने होंगे। इसके अलावा, अमेरिका के खाड़ी तट से भारत तक तेल लाने में लगने वाला समय और शिपिंग का खर्च भी रूस के मुकाबले कहीं ज्यादा है। जाहिर है कि अगर रिफाइनरी कंपनियों की लागत बढ़ती है, तो वे इस बोझ को खुद नहीं उठाएंगी। इसका सीधा असर पेट्रोल पंप पर आम आदमी को बढ़ी हुई कीमतों के रूप में देखने को मिल सकता है।