May 12, 2026

गरुड़ क्षेत्र की डाक व्यवस्था ध्वस्त: बनतोली डाकघर में 10 दिनों से पोस्टमैन गायब, डाक के अंबार तले दबे जनता के जरूरी दस्तावेज


गरुड़, बागेश्वर। पर्वतीय अंचलों में पहले ही सरकारी व्यवस्थाओं की सुस्ती से जूझ रही जनता अब डाक विभाग की चरमराई व्यवस्था का दंश झेलने को मजबूर हो गई है। गरुड़ क्षेत्र के बनतोली स्थित डाकघर में पिछले करीब दस दिनों से पोस्टमैन के अभाव में संपूर्ण डाक व्यवस्था लगभग ठप पड़ चुकी है। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि डाकघर के भीतर पत्रों, स्पीड पोस्ट और जरूरी दस्तावेजों का अंबार लगा हुआ है, लेकिन उन्हें लोगों तक पहुँचाने वाला कोई नहीं है।
इस लापरवाही का सीधा खामियाजा क्षेत्रीय जनता को भुगतना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि डाकघर में कई महत्वपूर्ण दस्तावेज महीनों की प्रतीक्षा के बाद पहुँचते हैं, जिनमें बेरोजगार युवाओं के नियुक्ति पत्र, बैंक संबंधी दस्तावेज, सरकारी सूचनाएँ और अन्य जरूरी पत्र शामिल हो सकते हैं। ऐसे में समय पर डाक न मिलने से लोगों के भविष्य पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार करीब दस दिन पूर्व पंकज भट्ट नामक पोस्टमैन नौकरी छोड़कर चला गया था। उसके बाद से विभाग ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की। परिणामस्वरूप पूरा तंत्र “राम भरोसे” संचालित हो रहा है। लोगों का आरोप है कि देहरादून से भेजी गई स्पीड पोस्ट तक दस दिनों बाद भी प्राप्त नहीं हो सकी है, जिससे विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
जब इस पूरे मामले में बागेश्वर के सहायक डाक अधीक्षक अनिल प्रसाद से जानकारी ली गई तो उन्होंने हैरानी जताते हुए कहा कि यह मामला उनके संज्ञान में ही नहीं था। अधिकारियों का यह जवाब स्वयं विभागीय निगरानी व्यवस्था की पोल खोलने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है।
स्थिति केवल बनतोली तक सीमित नहीं है। द्योनाई डाकघर की हालत भी कम चिंताजनक नहीं बताई जा रही। वहाँ के पोस्टमास्टर के अनुसार मार्च महीने से नेटवर्क समस्याओं के चलते कार्य सुचारू रूप से नहीं हो पा रहा है। विशेष रूप से गरीब ग्रामीणों के मनरेगा खातों के संचालन और नए खाते खोलने का कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इससे मजदूर वर्ग और ग्रामीण उपभोक्ताओं को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि डिजिटल इंडिया और ग्रामीण सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावों के बीच पहाड़ की जमीनी सच्चाई बेहद कड़वी है। डाक विभाग जैसी मूलभूत सेवा भी यदि इस प्रकार चरमराई रहेगी तो दूरस्थ गांवों में रहने वाले लोगों का सरकारी तंत्र से विश्वास उठना स्वाभाविक है।
अब बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर सरकार इस डूबती हुई डाक व्यवस्था को कब पटरी पर लाएगी, या फिर धीरे-धीरे इस पूरी व्यवस्था का अंतिम संस्कार ही कर दिया जाएगा। पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा और प्रशासनिक लापरवाही पर जनता में गहरा आक्रोश व्याप्त है।