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October 30, 2026

गरुड़ में छह महीने से टपक रही छत, बारिश में भीग रही सरकारी शिक्षा व्यवस्था

छ त्यानी के राजकीय इंटर कॉलेज में स्मार्ट क्लास और कंप्यूटर उपकरण खराब होने का दावा; ज्ञापन देकर उठी जांच और जवाबदेही की मांग

नरेंद्र बिष्ट बोले—हादसा हुआ तो जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी, अब सवाल यह कि छह महीने तक समस्या का समाधान क्यों नहीं हुआ?

गरुड़/बागेश्वर। सरकारी विद्यालयों में बेहतर और आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराने के दावों के बीच गरुड़ ब्लॉक के स्वतंत्रता सेनानी मानसिंह गुसाईं राजकीय इंटर कॉलेज छात्यानी से सामने आई तस्वीर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। आरोप है कि विद्यालय की छत पिछले करीब छह माह से टपक रही है और बारिश का पानी भवन के भीतर पहुंचने से विद्यालय में रखे कंप्यूटर, स्मार्ट क्लास की टीवी समेत इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरण खराब हो चुके हैं। इस संबंध में मंगलवार को क्षेत्रीय लोगों की ओर से प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर तत्काल कार्रवाई की मांग की गई।

मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह केवल एक भवन की मरम्मत का सवाल नहीं है। एक ओर बच्चों की सुरक्षा का प्रश्न है, तो दूसरी ओर सरकारी धन से उपलब्ध कराए गए शैक्षणिक संसाधनों के संरक्षण की जिम्मेदारी भी संबंधित विभाग पर है।

छह महीने से समस्या है तो कार्रवाई अब तक क्यों नहीं?

इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण और जांच योग्य सवाल यही है—यदि विद्यालय की छत छह महीने से लगातार टपक रही है, तो संबंधित विभाग को इसकी जानकारी कब मिली और जानकारी मिलने के बाद क्या कार्रवाई की गई?

क्या विद्यालय प्रबंधन ने लिखित रूप से उच्च अधिकारियों को इसकी सूचना दी थी?

यदि दी थी तो उस पर क्या निरीक्षण हुआ?

क्या भवन की तकनीकी जांच कराई गई?

मरम्मत के लिए धनराशि स्वीकृत हुई या नहीं?

और यदि स्वीकृत हुई तो काम धरातल पर क्यों नहीं पहुंचा?

इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है। क्योंकि किसी सरकारी भवन की खराब स्थिति को केवल मौसम या बारिश की समस्या बताकर टाला नहीं जा सकता। छह महीने का समय किसी भी जिम्मेदार व्यवस्था के लिए पर्याप्त होना चाहिए कि वह कम से कम समस्या का स्थायी समाधान शुरू कर सके।

पानी केवल छत से नहीं टपका, सरकारी संसाधनों पर भी पड़ा

शिकायत के मुताबिक बारिश के पानी के रिसाव से कंप्यूटर, स्मार्ट क्लास की टीवी तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण खराब हुए हैं। यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है तो यह सवाल भी उठेगा कि इन उपकरणों को खराब होने से बचाने के लिए समय रहते क्या कदम उठाए गए थे?

आज सरकारी विद्यालयों में डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए लाखों रुपये के संसाधन लगाए जा रहे हैं। ऐसे में यदि भवन की खराब छत के कारण वही संसाधन नष्ट हो रहे हैं, तो यह सिर्फ तकनीकी खराबी नहीं बल्कि सरकारी संपत्ति के संरक्षण की व्यवस्था पर सवाल है।

इसलिए मामले में केवल छत की मरम्मत पर्याप्त नहीं होगी। प्रशासन को यह भी देखना चाहिए कि खराब हुए उपकरणों की वास्तविक स्थिति क्या है, उन्हें कितना नुकसान हुआ और नुकसान के लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है।

प्रशासनिक दरवाजे पर पहुंचा प्रतिनिधिमंडल

इसी समस्या को लेकर गरुड़ ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष नरेंद्र बिष्ट के नेतृत्व में मंगलवार को तहसील मुख्यालय पहुंचकर उप जिलाधिकारी को ज्ञापन देने का प्रयास किया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उस समय उप जिलाधिकारी और तहसीलदार मौजूद नहीं थे, जिसके बाद मौजूद अधिकारी को ज्ञापन सौंपा गया।

ज्ञापन के माध्यम से विद्यालय की छत की समस्या का शीघ्र समाधान कराने और शिक्षण व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने की मांग की गई है।

नरेंद्र बिष्ट ने चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में विद्यालय की बदहाल स्थिति के कारण कोई अनहोनी या जनहानि होती है तो उसकी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

लेकिन क्या केवल चेतावनी से आगे बढ़ेगा मामला?

यहां खबर का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भी सामने आता है। राजनीतिक प्रतिनिधियों द्वारा ज्ञापन देना और प्रशासन से कार्रवाई की मांग करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन इसके बाद असली परीक्षा संबंधित विभाग की कार्रवाई की है।

प्रशासन को केवल ज्ञापन प्राप्त कर लेने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जरूरत है कि अधिकारी विद्यालय का स्थलीय निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति सामने लाएं और सार्वजनिक रूप से बताएं कि समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

क्योंकि सवाल किसी राजनीतिक दल का नहीं है।

सवाल स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का है।

सुरक्षा से बड़ा कोई विषय नहीं

विद्यालय भवन में लगातार पानी का रिसाव होने के साथ विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रभावित होने की बात सामने आई है। ऐसी स्थिति में सुरक्षा का तकनीकी आकलन आवश्यक है। बिना जांच के यह मान लेना उचित नहीं होगा कि भवन या विद्युत व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित है।

इसलिए संबंधित अधिकारियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि—

क्या भवन सुरक्षित है?
क्या विद्युत व्यवस्था की जांच हुई है?
क्या प्रभावित कक्षाओं में बच्चों को बैठाना सुरक्षित है?
क्या छत की मरम्मत के लिए कोई तकनीकी रिपोर्ट तैयार हुई है?
और सबसे अहम—क्या जिम्मेदार विभाग को पिछले छह महीनों से इस समस्या की जानकारी थी?

सरकारी स्कूल की छत से टपकता पानी व्यवस्था का ‘रियलिटी चेक’

छात्यानी का यह मामला उत्तराखंड के ग्रामीण सरकारी विद्यालयों की आधारभूत सुविधाओं पर व्यापक बहस का विषय बन सकता है। विद्यालयों में स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर और डिजिटल शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध कराना निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है, लेकिन स्मार्ट शिक्षा की पहली शर्त सुरक्षित विद्यालय भवन है।

यदि बच्चे उस कमरे में बैठकर पढ़ रहे हों जहां बारिश का पानी छत से टपक रहा हो, तो स्मार्ट क्लास की स्क्रीन कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, व्यवस्था की बुनियादी कमी सामने आ ही जाती है।

उपलब्ध स्कूल संबंधी ऑनलाइन रिकॉर्ड में छात्यानी का सरकारी इंटर कॉलेज गरुड़ ब्लॉक में स्थित सरकारी विद्यालय के रूप में दर्ज है और यहां कक्षा 6 से 12 तक की शिक्षा का उल्लेख मिलता है।

अब विभाग से चाहिए जवाब, आश्वासन नहीं

इस पूरे मामले में सबसे जरूरी है कि प्रशासन और शिक्षा विभाग आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर तथ्यों के आधार पर जांच कराए।

यदि छत वास्तव में छह महीने से टपक रही है तो मरम्मत में देरी का कारण सामने आना चाहिए।

यदि उपकरण पानी से खराब हुए हैं तो नुकसान का आकलन होना चाहिए।

यदि विद्यालय भवन विद्यार्थियों के लिए किसी भी दृष्टि से असुरक्षित है तो वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए।

और यदि शिकायत में लगाए गए आरोप तथ्यहीन हैं तो विभाग को निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।

यही निष्पक्ष प्रशासन की पहचान है।

अब निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर

ज्ञापन सौंप दिया गया है। शिकायत सार्वजनिक हो चुकी है। विद्यालय की छत और उपकरणों को लेकर सवाल उठ चुके हैं। अब इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन मौके पर जांच कब कराता है और संबंधित विभाग समस्या के समाधान के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।

क्योंकि किसी सरकारी विद्यालय में दुर्घटना होने के बाद जिम्मेदारी तय करने से बेहतर है कि संभावित दुर्घटना को पहले ही रोक दिया जाए।

छात्यानी इंटर कॉलेज का मामला अब सिर्फ एक टपकती छत का मामला नहीं रह गया है—यह बच्चों की सुरक्षा, सरकारी धन की सुरक्षा, शिक्षा के अधिकार और सरकारी तंत्र की जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।

अब देखना यह है कि इस ज्ञापन के बाद छत पर मरम्मत का काम शुरू होता है या फिर यह शिकायत भी सरकारी फाइलों में बारिश के पानी की तरह बहकर गायब हो जाती है।

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