September 19, 2026

आस्था, संस्कृति और व्यापार का संगम बना मां कोट भ्रामरी का तीन दिवसीय मेला

अर्जुन राणा

कत्यूर घाटी में गूंजे मां नंदा-भ्रामरी के जयकारे, लोक संस्कृति ने बांधा समां; श्रद्धालुओं और व्यापारियों से गुलजार रहा डंगोली

गरुड़ , बागेश्वर । कत्यूर घाटी की धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक विरासत और समृद्ध लोक संस्कृति का प्रतीक मां कोट भ्रामरी नंदाष्टमी मेला शनिवार को धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-अर्चना और मां के जयकारों के बीच संपन्न हो गया। डंगोली स्थित मां कोट भ्रामरी मंदिर परिसर में तीन दिनों तक चले इस ऐतिहासिक मेले में कुमाऊं और गढ़वाल के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचे। 17 से 19 सितंबर तक आयोजित मेले को लेकर क्षेत्र में लंबे समय से उत्साह का माहौल था।

मेले के दौरान पूरा डंगोली और कत्यूर क्षेत्र ‘जय मां भ्रामरी’, ‘जय मां नंदा’ के जयकारों से गूंजता रहा। मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना के साथ पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। शुक्रवार को मवई गांव से कदली वृक्ष को पारंपरिक रीति-रिवाजों, ढोल-नगाड़ों और श्रद्धालुओं की मौजूदगी में मंदिर परिसर तक लाकर स्थापित किया गया। यह धार्मिक परंपरा मेले की विशिष्ट पहचान रही।

कत्यूर राजवंश की आस्था से जुड़ा है धाम

मां कोट भ्रामरी का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कुमाऊं के इतिहास और लोकविश्वास का महत्वपूर्ण केंद्र भी माना जाता है। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के उत्सव पोर्टल के अनुसार डंगोली में आयोजित होने वाला कोट भ्रामरी मेला ‘कोट की माई’ के मेले के रूप में भी जाना जाता है और इसका संबंध कत्यूर घाटी की ऐतिहासिक परंपराओं से जोड़ा जाता है।

लोकमान्यता के अनुसार मां भ्रामरी कत्यूर राजाओं की कुलदेवी और मां नंदा चंद राजाओं की कुलदेवी रही हैं। यही कारण है कि कोट भ्रामरी धाम में दोनों देवियों की सामूहिक आराधना इस स्थान को विशिष्ट धार्मिक पहचान प्रदान करती है।

मां भ्रामरी के संबंध में प्रचलित पौराणिक मान्यता के अनुसार कत्यूर घाटी में अत्याचारी असुर अरुण के संहार के लिए देवी ने भंवरे का रूप धारण किया था। इसी कारण यहां भगवती के भ्रामरी स्वरूप की आराधना की जाती है। यह कथा आज भी क्षेत्र की लोकपरंपरा और धार्मिक आस्था में गहराई से रची-बसी है।

कुमाऊं-गढ़वाल की साझा आस्था का केंद्र

कोट भ्रामरी मेला केवल बागेश्वर या गरुड़ क्षेत्र तक सीमित धार्मिक आयोजन नहीं है। ऐतिहासिक रूप से यह कुमाऊं और गढ़वाल की सांस्कृतिक एकता और साझा आस्था का भी प्रतीक रहा है। पूर्व के आयोजनों में दोनों मंडलों के दूरदराज क्षेत्रों से श्रद्धालुओं के पहुंचने और मेले में खरीदारी करने का उल्लेख मिलता रहा है।

यही कारण है कि मेले के दौरान डंगोली में केवल धार्मिक वातावरण ही नहीं दिखाई देता, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों की लोक बोलियां, वेशभूषा, खान-पान और परंपराएं भी एक-दूसरे से मिलती हैं। पहाड़ के गांवों से लोग परिवार सहित मेले में पहुंचते हैं और मां के दर्शन के साथ अपनी पुरानी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को भी जीवंत रखते हैं।

मेले ने दिया स्थानीय व्यापार को संबल

कोट भ्रामरी मेला धार्मिक आयोजन होने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण व्यापार का महत्वपूर्ण आधार भी है। मेले में स्थानीय तथा बाहरी व्यापारी विभिन्न प्रकार की दुकानें लगाते हैं। कपड़े, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, खिलौने, श्रृंगार सामग्री, मिठाइयां, खान-पान की दुकानें और अन्य सामान मेले में आकर्षण का केंद्र रहे।

पूर्व के आयोजनों में भी दूरदराज से आए व्यापारियों द्वारा मेले में कारोबार करने और श्रद्धालुओं द्वारा जमकर खरीदारी किए जाने की जानकारी सामने आती रही है।

मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां होने वाला व्यापार सिर्फ बड़े कारोबारियों तक सीमित नहीं रहता। आसपास के गांवों के छोटे दुकानदार, कारीगर और स्थानीय उत्पाद बेचने वाले लोग भी मेले से आर्थिक लाभ प्राप्त करते हैं। इस दृष्टि से मेला ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आता है।

लोक संस्कृति की जीवंत पाठशाला बना मेला

कोट भ्रामरी मेला पहाड़ की लोक संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। यहां धार्मिक परंपराओं के साथ ढोल-नगाड़े, लोकगीत, जागर, झोड़ा-चांचरी और पारंपरिक वेशभूषा जैसे सांस्कृतिक रंग दिखाई देते हैं।

मां के जयकारों के बीच पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन और लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां मेले के वातावरण को और जीवंत बनाती हैं। पूर्व के आयोजनों में भी झोड़ा-चांचरी तथा अन्य कुमाऊं-गढ़वाल की लोक परंपराओं की प्रस्तुतियां मेले की विशेष पहचान रही हैं।
लेकिन हर वर्ष की भांति इसबार भी हमारे पहाड़ के प्रसिद्ध भगनोल सबसे प्राचीन लोकगीतों को मेले कमेटी ने अनदेखा ही कर दिया। सुदूर गेवाड़ घाटी से पहुचे लोकगायकों को इसबार भी निराश ही होना पड़ा। शराब पीकर मस्त हुए लोगों द्वारा उन्हें मैदान छोड़कर जाने को मजबूर कर दिया। जबकि उन्हें सुनने को दूर 2 से लोग मेले में आते है। मेला कमेटी को चाहिए कि इन कलाकारों के लिए भी दूसरे मंच की तरह व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

इस प्रकार यह मेला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि कुमाऊं की मौखिक परंपरा, लोक संगीत, लोक नृत्य और सामुदायिक जीवन की जीवंत विरासत को संरक्षित करने वाला मंच भी है।

परंपरा और आधुनिक व्यवस्था का मेल

इस वर्ष मेले को व्यवस्थित एवं सुरक्षित ढंग से संपन्न कराने के लिए प्रशासन और मेला समिति की ओर से तैयारियां की गई थीं। आयोजन को लेकर हुई बैठकों में व्यवस्थाओं को समय से पूरा करने, मार्ग दुरुस्त करने और मेले में आने वाले बाहरी दुकानदारों के सत्यापन जैसे विषयों पर जोर दिया गया था।

मेले में आधुनिक व्यवस्थाओं के साथ पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने का प्रयास भी दिखाई दिया। धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक जुलूसों में ग्रामीणों की भागीदारी ने मेले की पुरानी पहचान को बरकरार रखा।

सिर्फ मेला नहीं, पीढ़ियों को जोड़ने वाली परंपरा

कोट भ्रामरी का मेला इस बात का उदाहरण है कि उत्तराखंड के पर्वतीय समाज में धार्मिक आयोजन किस तरह सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। बुजुर्ग जहां अपनी परंपराएं अगली पीढ़ी को बताते हैं, वहीं बच्चे और युवा मेले के माध्यम से अपनी जड़ों, लोक संस्कृति और पारंपरिक आस्थाओं से परिचित होते हैं।

मेले में दूर-दराज से आने वाले प्रवासी परिवारों की भागीदारी भी इसे विशेष बनाती है। वर्षभर रोजगार और अन्य कारणों से शहरों में रहने वाले लोग भी ऐसे अवसरों पर अपने गांव-क्षेत्र लौटकर सामूहिक धार्मिक और सामाजिक जीवन का हिस्सा बनते हैं।

कत्यूर घाटी की पहचान को आगे बढ़ाने की जरूरत

कोट भ्रामरी मेला कत्यूर घाटी की ऐसी विरासत है जिसमें धर्म, इतिहास, लोककला, सामाजिक एकता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था—पांचों आयाम एक साथ दिखाई देते हैं। ऐसे आयोजनों के संरक्षण और व्यवस्थित विकास से क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक स्तर पर सामने लाया जा सकता है।

उत्तराखंड पर्यटन के आधिकारिक पोर्टल पर भी कोट भ्रामरी मंदिर को धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व वाले स्थल के रूप में दर्ज किया गया है और मेले में लोकगीत, जागर तथा लोकनृत्य जैसी गतिविधियों का उल्लेख किया गया है।

तीन दिनों तक चले इस आयोजन के समापन के साथ भले ही डंगोली का मेला शांत हो गया हो, लेकिन मां कोट भ्रामरी के जयकारों, ढोल-नगाड़ों की गूंज और पहाड़ की लोक संस्कृति की छाप लोगों के मन में लंबे समय तक बनी रहेगी। यही इस मेले की सबसे बड़ी ताकत है कि यहां श्रद्धा केवल मंदिर की चौखट तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह समाज, संस्कृति और स्थानीय जीवन को एक सूत्र में बांध देती है।