रोजगार के दावेे और बंद होती रहीं फैक्ट्रियां
देहरादून, ( आखरीआंख ) उत्तराखंड का गठन इस मूल विचार के साथ हुआ था कि यहां के युवाओं को रोजगार के लिए बाहर के धक्के नहीं खाने पड़ेंगे। हर बार चुनाव में राजनीतिक दल पलायन रोकने के दावे करके चुनाव मैदान में उतरते रहे लेकिन बीते 18 साल में राज्य में उद्योगों के लिए कोई ठोस नीति नहीं बन पाई। जिसका खामियाजा यहां के युवाओं को पलायन का दंश झेल कर उठाना पड़ रहा है। हालात इतने बुरे हैं कि लगातार एक के बाद एक फैक्ट्री, कारखाने बंद होते जा रहे हैं और राज्य के युवा महानगरों की गलियों में खोकर अपना जीवन बिता रहे हैं।
उत्तराखंड को 18 साल में आठ मुख्यमंत्री मिल गए हैं और सभी युवाओं को रोजगार देने, पलायन रोकने के वादे करते रहे हैं। मौजूदा सरकार ने तो पलायन रोकने के लिए पलायन आयोग तक का गठन कर दिया है लेकिन लेकिन अब भी न तो युवाओं को बेहतर भविष्य मिला और न ही रोजगार के साधन उपलब्ध हो रहे हैं। हालत यह है कि गांव के गांव आज वीरान हो रहे हैं और उद्योग लगातार बंद होते जा रहे हैं। ऐसे में जनता अपने नुमाइंदों से चुनावी वक्त में सवाल पूछ रही है। ऋषिकेश निवासी अमित डंगवाल कहते हैं पांच साल पहले लोगों ने जिन उम्मीदों के साथ वोट दिया था वह पूरी होती नहीं दिख रही हैं। रोजगार मिलने, बंद फैक्ट्रियां शुरू होने के वादे नेताओं ने किए थे लेकिन पांच साल बाद अब सारे मुद्दे ही बदल गए हैं।
