February 29, 2024

बढ़ती उम्र में लें अनुभवों का मजा

आखरीआंख

नि:संदेह हम सभी यह समझते हैं कि सफलता व काम करने का उम्र के साथ संबंध होता है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे व्यक्ति की कार्य करने की क्षमता घटती जाती है। पर यह केवल एक मिथक है। यदि व्यक्ति बढ़ती आयु में भी लगातार सक्रिय रहे तो आयु उसकी क्षमता को कम नहीं करती, बल्कि उसे और अनुभवी बनाकर निखारती है। नार्मन विन्सेन्ट पील का मानना है कि ‘संघर्ष, लक्ष्य और उत्साह ही किसी को चैपियन बनाते हैं।Ó
नौकरी पाने की एक निश्चित आयु हो सकती है लेकिन शिक्षा प्राप्त करने, संघर्ष करने व अपने लक्ष्य को पाने की कोई उम्र नहीं होती। व्यक्ति किसी भी उम्र में यह सब प्राप्त कर सकता है, हां इसके लिए उसके हृदय में उत्साह, प्रसन्नता व काम करने की ललक होनी चाहिए। इसी ललक, उत्साह व प्रसन्नता के नए मापदंड विकसित किए हैं मेजर जनरल वी.डी. डोगरा और गगन खोसला ने। मेजर जनरल वी.डी डोगरा दुनिया के पहले सर्विंग ऑफिसर और मेजर जनरल हैं, जिन्होंने आयरनमैन का खिताब प्राप्त किया है। इतना ही नहीं, वे सबसे यादा उम्र में दो बार आयरनमैन का खिताब पाने वाले इकलौते भारतीय भी हैं। उन्होंने बीते साल ऑस्िट्रया के क्लैंगफर्ट में हुई आयरनमैन की प्रतियोगिता के बाद इस बार भी जर्मनी के हैमबर्ग में इस खिताब को हासिल किया।
आयरनमैन एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता है, जिसमें प्रतियोगी को एक बार 3.8 कि.मी स्वीमिंग, 42.2 कि. मी. रनिंग और 180 कि.मी. साइकिलिंग करनी होती है। इस प्रतियोगिता को 17 घंटे के अंदर पूरा करना होता है। मेजर जनरल डोगरा ने पिछली बार इसे 14 घंटे 21 मिनट में पूरा किया था और अपने ही रिकॉर्ड में सुधार करते हुए उन्होंने इस बार इस प्रतियोगिता को 13 घंटे 40 मिनट में पूरा किया। उस पर इस प्रतियोगिता में 60 वर्ष के व्यक्ति का विजयी होना हैरत भरा है न। मेजर जनरल वी.के. डोगरा का यह कहना है कि इसमें हैरत वाली कोई बात नहीं है। नियमित व्यायाम और अयास से हर कठिनाई पर विजय पाई जा सकती है।
इसी तरह 62 साल के गगन कुमार ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक साइकिल से यात्रा की। यह यात्रा उन्होंने 20 सितबर, 2016 को लेह से प्रारंभ की थी और 20 अक्तूबर, 2016 को इसे पूरा किया। इस दौरान उन्होंने 13 रायों से होते हुए कश्मीर से कन्याकुमारी तक 4300 कि.मी. का रास्ता तय किया। गगन नारंग अपने स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए नियमित जिम और दौड़ लगाते हैं। भारतीय समाज में अक्सर लोग देखते हैं कि 60-65 की आयु पार करने के बाद अमूनन वृद्धजन घर के एक कोने में बैठ जाते हैं अथवा भजन कीर्तन को ही अपने जीवन का उद्देश्य समझ लेते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। जीवन के हर पल को किसी भी उम्र में जिया जा सकता है। जिंदगी जीने के लिए है, आनंद उठाने के लिए है, अपने अंतिम पलों का इंतजार करने के लिए नहीं। हमारे सामने अनेक ऐसे भी उदाहण हैं, जिन्होंने खतरनाक से खतरनाक बीमारी को भी हराकर जीवन को जीता है।
असंय शोधकर्ताओं ने इस बात को साबित किया है कि सीखने की योग्यता 70 की आयु में भी उतनी ही अछी होती है, जितनी कि 17 वर्ष की आयु में। यदि व्यक्ति सृजन करता रहे तो उसे अपनी बढ़ती आयु का पता ही न चले। यही कारण है कि सृजनात्मक कार्य करने वाले-शोध वैज्ञानिक, आविष्कारक, पेंटर, लेखक, दार्शनिक आदि गैर-सृजनात्मक कार्य करने वालों से यादा लंबे समय तक उत्पादक बने रहते हैं। थॉमस अल्वा एडीसन 90 की उम्र में भी सक्रिय रहकर आविष्कार करने में लगे हुए थे। माइकल एंजेलों ने 80 की उम्र पार करने के बाद भी अपनी कुछ सर्वश्रेष्ठ पेंटिंग बनाई थीं। पिकासो 75 की उम्र के बाद भी कला संसार में अपनी धाक जमाए हुए थे और शॉ 90 की उम्र होने पर भी नाटक लिखने में लगे हुए थे। इसी तरह माइकल डेबेकी 90 साल की उम्र में भी विश्व के नबर 1 हार्ट सर्जन थे। वे इतनी उम्र में भी नियमित रूप से ऑपरेशन करते थे। इन सभी विभूतियों के लिए उम्र केवल एक नबर की तरह थी। उन पर उम्र बढऩे के कोई चिन्ह नहीं थे।
डॉ. अरनॉल्ड ए. हट्शनैकर कहते हैं कि, ‘हम वर्षों की वजह से नहीं, घटनाओं और उन पर हमारी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं की वजह से बूढ़े होते हैं। इटली के सारडीनिया द्वीप में 100 साल की आयु पार करने के बाद भी अनेक लोग हंसते और खिलखिलाते हुए आनंदपूर्वक जीवन जी रहे हैं। वहां 90 की उम्र तक लोग अपने सारे काम खुद करते हैं। यही कारण है कि सृजनात्मकता में लगे रहने वाले, मुस्कराकर रहने वाले और मिलजुलकर रहने वाले लोग आयु बढऩे पर भी बुढ़ापे की कुर्सी पर बैठना पसंद नहीं करते। ऐसा हम सब कर सकते हैं, बस उसके लिए हमें इतना करना है कि बढ़ती आयु के साथ हर दिन इस धारणा को पुता करते जाना है कि जीवन में करने के लिए और देखने के लिए अभी बहुत कुछ शेष है। उम्र बढऩे के साथ-साथ एक नए अनुभव के साथ-साथ नए सिरे से जीना सिखा रहा है।