24 में गैर-भाजपावाद?
संभव नहीं कि ऐसा कोई सीन बने। यों ऐसे आशावादी है जो मानते है कि विपक्ष से सन् 2024 में भाजपा को मुश्किल होगी। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर इसकी गणित बताते हुए है। उन्हे क्षत्रपों से भरोसा है। लेकिन आम चुनाव में गणित से ज्यादा जनता से कनेक्टीविटी की केमेस्ट्री का मतलब होता है। और ऐसा नेता की बदौलत। गौर करें हाल के दो-चार महिनों पर। ममता बनर्जी लगातार राष्ट्रीय राजनीति की फू-फा करते हुए है। हाल में उन्होने विरोधी पार्टियों के नेताओं को पत्र लिखा। ऐसे ही तेलंगाना के चंद्रशेखर राव ने मुंबई जा कर शरद पवार से बात की। द्यशद्म ह्यड्डड्ढद्धड्ड द्गद्यद्गष्ह्लद्बशठ्ठ 2024
शरद पवार अर्से से राष्ट्रीय महत्वकांक्षा में फडफडाते हुए है। उधर प्रशांत किशोर ममता बनर्जी, शरद पवार आदि के साथ अखिल भारतीय चुनावी जमीन बनाने की कोशिश में है। मगर क्या कोई एक भी नेता, एक भी कोशिश वह स्पार्क लिए हुए है जिससे सबका लक्ष्य एक दिशा में जाता समझ आए? एक भी कोई नेता वैसे धुरी बनता हुआ लगता है जैसे सन् 1977 में जयप्रकाश नारायण थे, 1989 में हरकिशनसिंह सुरजीत, वीपीसिंह हुए थे या बाद में अटलबिहारी वाजपेयी के इर्द-गिर्द जमावड़ा बना था।
हां, गैर-कांग्रेसवाद के खिलाफ भारत में विपक्षी गठजोड तभी कामयाब हुआ जब दो -चार नेता धुन के साथ पार्टियों को मनाने-पटाने, प्रोग्राम बनवाने, आंदोलन करवाने में जुटे रहे। चंद्रबाबू नायडू, शरद यादव से ले लेकर सीपीएम के हरकिशन सिंह सुरजीत की भागदौड जबरदस्त हुआ करती थी। दक्षिण में भी एनटी रामाराव, रामकृष्ण हेगड़े और चंद्रबाबू नायडु ने कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष बनाने के लिए कम काम नहीं किया था। आज कौन है? चंद्रशेखर राव में छटपटाहट है लेकिन उन्हे भी यह समझ नहीं आता कि कांग्रेस की धुरी के बिना विपक्ष खड़ा नहीं हो सकता। और कांग्रेस की दिक्कत यह है कि वह लगातार निराकार लीडरशीप में है। राहुल गांधी अपनी पार्टी के भीतर ही नेताओं का मन जीते हुए नहीं है तो केसीआर, ममता, शरद पवार, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल से कैसे कैमेस्ट्री बना सकते है।
पहली बात पार्टियों और उनके नेताओं के साथ कौन बात करें? पार्टियों के बीच कौन संवाद बनवा सकता है? किसके बस में साझा प्रोग्राम, साझा चुनावी रणनीति और साझा आंदोलनों का खांका बनवाना संभव है? लेफ्ट नेता सुरजीत का अपना कोई करिश्मा नहीं था लेकिन बावजूद इसके उन्होने गैर-कांग्रेसी राजनीति में अंहम रोल अदा किया। लेफ्ट की विरासत के सीताराम यचूरी भी जमीनी राजनीति में बेमतलब है लेकिन तमाम विरोधी पार्टियों के साथ सीधे उनका कहीं कोई टकराव नहीं है तो सोनिया गांधी, राहुल गांधी, केसीआर, लालू, अखिलेश और ममता के बीच सुरजीत जैसी भागदौड करें तब भी कुछ विपक्षी तालमेल की गति बने। मगर नेताओं की जगह प्रशांत किशोर की भागदौड का हल्ला सुनाई दे रहा है।
दरअसल जैसे क्षेत्रिय पार्टियों का मामला है वैसे अब लेफ्ट और कांग्रेस का भी है। ये भी अपने-अपने राज्य में सिमट गए है। गैर-कांग्रेसवाद के समय जनसंघ, समाजवादी, स्वतंत्र पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सरोकारों में सोचती हुई थी। राष्ट्रीय पार्टियां बाकि पार्टियों को लीड करती थी। अब ममता बनर्जी, केसीआर या केजरीवाल अपने इलाके में रहकर धुरी बनने की खामोख्याली में है। अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, हेमंत सोरेन, कुमारस्वामी में सभी अपने प्रदेश में सिमटे हुए या अपने विस्तार की चिंता में है।
