March 12, 2026

लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं राजनीतिक टकराव



संसद के बजट सत्र की हंगामेदार शुरुआत ने इन आशंकाओं को सही साबित कर दिया है कि 18वीं लोकसभा और तीसरे कार्यकाल में मोदी सरकार की डगर आसान नहीं होगी।  संसद के अंदर और बाहर सरकार को कठघरे में खड़ा करने का कोई मौका विपक्ष नहीं छोड़ रहा है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा न मानें, लेकिन बहुमत के आंकड़े से पीछे रह जाने और तेलुगु देशम, जदयू और लोजपा जैसे सहयोगी दलों पर निर्भरता का असर साफ दिख रहा है।  विशेष सत्र में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ हर मौके पर सरकार पर हमलावर रहा।  दस साल बाद संसद में ऐसा नजारा दिखा।  ध्यान रहे, दस साल बाद ही विपक्ष को राहुल गांधी के रूप में नेता प्रतिपक्ष मिला है।
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान मोदी बनाम राहुल का जो टकराव नजर आया था, वह बजट सत्र में और तीखा होता दिख रहा है।  नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के भाषण के बीच मंत्रियों द्वारा टोकाटाकी और प्रधानमंत्री के जवाब के बीच विपक्ष की लगातार नारेबाजी को उचित नहीं माना जा सकता।  ऐसा लगता है कि संसदीय परंपरा और मर्यादा अब बीते जमाने की बातें बन कर रह गयी हैं।  इसलिए आश्चर्य नहीं कि हम बजट सत्र में भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच उसी टकरावपूर्ण व्यवहार का विस्तार देख रहे हैं।
कोई भी यह स्वीकारने को तैयार नहीं कि संसद देश के हित में काम करने के लिए है, न कि दलगत राजनीति का अखाड़ा बनाने के लिए।  ऐसा पहली बार नहीं है कि सत्तापक्ष अपने बजट को सर्वांगीण विकास का दस्तावेज बता रहा है, तो विपक्ष उसे दिशाहीन कह रहा है, पर

बिहार और आंध्र प्रदेश को विशेष सहायता की घोषणाओं ने बजट को राजनीतिक ‘एंगल’ दे दिया है।  विपक्ष ने इसे ‘कुर्सी बचाओ बजट’ करार दिया है।  मोदी सरकार तेलुगू देशम और जदयू के समर्थन पर टिकी है।  आंध्र प्रदेश और बिहार लंबे समय से विशेष राज्य का दर्जा और विशेष पैकेज मांगते रहे हैं।  चंद्रबाबू नायडू इसी मांग पर 2018 में राजग छोड़ कर विपक्ष के खेमे में चले गये थे।  नीतीश कुमार भी अलग-अलग मुद्दों पर कई बार पाला बदल चुके हैं।  दोनों जब राजग में लौटे, तो राजनीतिक जरूरतों के अलावा विशेष आर्थिक मदद की उम्मीद भी बड़ा कारण रही।

में मोदी सरकार की नैया पार लगवायी थी।
बजट सत्र के बीच ही नीति आयोग की बैठक को ले कर भी सत्तापक्ष और विपक्ष में सीधा टकराव नजर आया।  नीति आयोग की 27 जुलाई को हुई बैठक में दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भाग नहीं लिया।  इनमें बिहार के नीतीश कुमार और पुद्दुचेरी के एन रंगासामी के अलावा सभी गैर-राजग दलों के मुख्यमंत्री हैं।  विपक्षी खेमे से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही बैठक में पहुंचीं, लेकिन पांच मिनट बाद ही माइक बंद कर दिये जोन का आरोप लगाते हुए बाहर निकल आयीं।  नीति आयोग ने हर मुख्यमंत्री के लिए समय आवंटन का स्पष्टीकरण दिया है, लेकिन इस विवाद से सत्ता पक्ष और विपक्ष में टकराव बढ़ेगा ही।