“बेडू पाको बारामासा” — पहाड़ की आत्मा, इतिहास की धुन और भारत का गौरव
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अर्जुन राणा
बागेश्वर । जब किसी समाज की संस्कृति सदियों तक जीवंत रहती है, तो उसकी पहचान कुछ गीतों, कुछ धुनों और कुछ परंपराओं में सिमटकर भी अमर हो जाती है। उत्तराखंड के लिए ऐसा ही एक गीत है—“बेडू पाको बारामासा”। यह गीत सिर्फ सुरों का संगम नहीं, बल्कि वह गूंज है जो पहाड़ की घाटियों, खेतों, लोक-त्योहारों और जनजीवन के बीच धड़कती आई है।
आज अपने शपथ ग्रहण समारोह उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन बागेश्वर में जब युवा गायक अर्जुन गढ़िया ने अपने वासुरी वादक साथी के साथ यह गीत गाया तो शपथ ग्रहण समारोह में जब यह अमर लोकगीत गूंजा, तो वह क्षण केवल एक प्रस्तुति नहीं था—वह अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान को नमन करने जैसा था। यही कारण था कि मंचासीन सभी अतिथियों सहित उपजिलाधिकारी तक इसकी धुनों में झूमते देखी गई।
आज मै इस गीत के अतीत में आपको ले जाने की एक नाकाम कोशिश करता हूं।
आज इस गीत का इतिहास उतना ही रोचक है जितनी इसकी धुन मधुर है।
1952: नैनीताल के एक स्कूल से शुरू हुई यात्रा
लोककथाओं और शोधों के अनुसार “बेडू पाको…” पहली बार 1952 में नैनीताल के एक स्कूल समारोह में सुना गया। उस समय यह लोकगीत पहाड़ी जनजीवन का सहज, अनगढ़ प्रतिबिंब था—कुछ पंक्तियाँ किसी की यादों में बसती थीं, कुछ धुनें किसी की लोरी में, तो कुछ स्वर गाँवों की चौपालों में मिलते थे।
यहीं से इस गीत की धुन ने वह आकार लेना शुरू किया जो आगे विश्वभर में पहचाना जाने वाला बना।
मोहन उप्रेती और ब्रजेन्द्रलाल शाह: जिन्होंने लोकधुन को पहचान दी
इस गीत को कला की पूर्णता देने का श्रेय जाता है दो दिग्गजों को—
मोहन उप्रेती और ब्रजेन्द्रलाल शाह।
उन्होंने पहाड़-भर में घूमकर इस गीत के अलग-अलग हिस्से जुटाए, इसकी धुन को तराशा और अंतरों को जोड़ा। इस तरह एक अनगढ़ लोकस्वर एक सुंदर, व्यवस्थित और प्रस्तुत करने योग्य रचना में बदल गया।
कहना गलत न होगा कि यदि उप्रेती और शाह की मेहनत न होती, तो “बेडु पाको” शायद पहाड़ की सीमाओं के भीतर ही दबा रह जाता। एक रोचक तथ्य यह भी है कि इस गीत का मूल अंतिम अंतरा आज की प्रस्तुतियों में दुर्लभ है, समय के प्रवाह में खो गया।
1955: त्रिमूर्ति भवन में पहली राष्ट्रीय गूंज
गीत का भाग्य बदलने वाला क्षण आया 1955 में, जब रूस के राष्ट्रपति भारत आए थे। दिल्ली स्थित त्रिमूर्ति भवन में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के दौरान स्वयं मोहन उप्रेती और नजमा खान ने “बेडू पाको” की प्रस्तुति दी।
जब यह गीत वहाँ गूंजा, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मंतमुग्ध रह गए। उनकी प्रसन्नता इतनी थी कि उन्होंने स्नेहपूर्वक उप्रेती को “बेडू बॉय” की उपाधि दी। यह क्षण उत्तराखंड के लोकसंगीत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।
पहाड़ से सात समुंदर पार
इसके बाद इस गीत ने सीमाएँ लांघ दीं। अमेरिका के एक स्कूल में जब बच्चों के समूह ने “बेडू पाको” गाया, तो यह स्पष्ट हो गया कि यह धुन केवल पहाड़ की नहीं, बल्कि वैश्विक लोकसंस्कृति की धरोहर बन चुकी है।
लोकप्रिय मंचों पर चमकती धुन
बॉलीवुड और राष्ट्रीय मंचों पर भी इस गीत ने अपना खास स्थान बनाया।
अनुष्का शर्मा, विद्या बालन और उर्वशी रौतेला ने बड़े मंचों पर इस गीत को गाकर इसकी प्रसिद्धि को नई बुलंदियों तक पहुँचाया।
यह गीत अब सिर्फ एक लोकधुन नहीं रहा—यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन गया।
गोपाल बाबू गोस्वामी: जिन्होंने गीत को जन-जन तक पहुँचाया
उत्तराखंड के महान लोकगायक गोपाल बाबू गोस्वामी ने इस गीत के प्रचार-प्रसार में क्रांतिकारी भूमिका निभाई। उनकी गायकी ने “बेडु पाको” को गाँव-गाँव, मेलों, साहसिक कार्यक्रमों, विद्यालयों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचा दिया।
उनकी मधुर आवाज़ ने इस गीत में वह जादू घोला जिसने इसे घर-घर का गीत बना दिया।
कुमाऊँ रेजीमेंट और गढ़वाल राइफल—आज भी इसकी धुन पर गर्व से कदम बढ़ाते हैं
इस गीत का सबसे गौरवपूर्ण पहलू यह है कि आज भी कुमाऊँ रेजीमेंट और गढ़वाल राइफल्स—भारतीय सेना की दो वीरतम इकाइयाँ—इस गीत को अपनी आधिकारिक धुन और मार्चिंग सॉन्ग के रूप में प्रयोग करती हैं।
जब सैनिक “बेडु पाको बारामासा” की धुन पर कदमताल करते हैं, तो पहाड़ की मिट्टी का गौरव दुनिया के सामने सिर ऊँचा करके खड़ा होता है।
यह गीत केवल संस्कृति ही नहीं, सेना की शौर्य परंपरा का हिस्सा बन चुका है—एक ऐसी धुन जिसे सुनकर हर उत्तराखंडी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
क्यों अमर है “बेडू पाको”?
यह गीत आज भी ताज़ा क्यों लगता है?
क्यों इसे सुनते ही मन पहाड़ की तरफ उड़ने लगता है?
क्योंकि—
इसमें पहाड़ के बारहमासा ऋतुओं, पेड़ों-फलों, त्योहारों, ग्रामीण जीवन और लोकजीवन की सहजता का चित्रण है।
इसकी धुन में वह मिठास है जो हर श्रुति में प्रकृति की सुगंध भर देती है।
यह गीत पहचान है, स्मृति है, भाव है और गौरव भी।
यह गीत सूरज की तरह है—हर युग में उतना ही चमकदार।
समापन: एक गीत, जो विरासत भी है और भविष्य भी
“बेडु पाको बारामासा” केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा की आवाज़ है। यह वह गीत है जिसने गाँव की चौपाल से शुरू होकर त्रिमूर्ति भवन, अमेरिकी स्कूलों, सेना की परेड ग्राउंड और आज के वैश्विक मंच तक की यात्रा की है।
आपके जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जब यह गीत गूंजता है, तो यह केवल धुन नहीं—एक परंपरा का पुनर्जन्म होता है, एक गौरवमयी विरासत का स्मरण होता है।
यह गीत आगे भी पीढ़ियों को प्रेरित करेगा—
सांस्कृतिक गौरव की तरह,
जड़ों के एहसास की तरह,
और भारत माता के वीर सैनिकों की कदमताल की तरह।
