February 9, 2026

गरुड में जब मृतक बोला मुझे हो सकता हैं 1 लाख का नुकसान!! पाँच साल पहले ‘मृत’ कर दिया गया जीवित किसान, जमीन भी कर दी गई स्थानांतरित


गरुड़, बागेश्वर । जनपद की द्योनाई घाटी इन दिनों एक ऐसे प्रशासनिक चमत्कार की चर्चा से गूंज रही है, जिसे सुनकर न केवल हैरानी होती है बल्कि व्यवस्था पर गहरा सवाल भी खड़ा होता है। तहसील गरुड़ क्षेत्र के रिठाड़ गांव में राजस्व विभाग ने अपने भूमि अभिलेखों में एक जीवित व्यक्ति को पाँच वर्ष पूर्व मृत घोषित कर दिया, और इससे भी आगे बढ़ते हुए उसकी पुश्तैनी भूमि को उसकी पत्नी एवं पुत्र के नाम बाकायदा दर्ज भी कर दिया। यह मामला अब पूरे क्षेत्र में सनसनी का विषय बन चुका है।
इस अविश्वसनीय घटना का खुलासा तब हुआ जब रिठाड़ गांव निवासी मोहन सिंह पुत्र रतन सिंह, राजकीय इंटर कॉलेज बनतोली में प्रस्तावित किसान रजिस्ट्री शिविर के लिए अपनी खाता-खतौनी निकलवाने पहुंचे। जैसे ही उन्होंने दस्तावेज़ पर नज़र डाली, उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें जीवित नहीं, बल्कि “मृतक” दर्शाया गया था। हैरानी यहीं खत्म नहीं हुई—उनकी वर्षों की पुश्तैनी जमीन का स्वामित्व उनकी पत्नी हंसी देवी और पुत्र गोविंद सिंह के नाम सफलतापूर्वक दर्ज किया जा चुका था।
यह प्रकरण इसलिए भी अधिक चौंकाने वाला है क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में किसी मृत व्यक्ति की भूमि का नामांतरण करवाने के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र सहित अनेक औपचारिकताओं को पूरा करना पड़ता है और संबंधित व्यक्ति को महीनों तक दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। लेकिन इस मामले में न मृत्यु प्रमाण पत्र का कोई प्रश्न उठा, न ही जटिल प्रक्रियाओं की बाधा सामने आई। मानो व्यवस्था ने स्वयं ही सभी औपचारिकताओं को दरकिनार कर दिया हो।
आज सुबह तथाकथित ‘मृतक’ मोहन सिंह ने आपके लोकप्रिय ” आखरीआंख समाचार ” से बातचीत में गहरी पीड़ा और आश्चर्य व्यक्त करते हुए बताया कि उन्हें सरकारी आदेश संख्या 664-20 दिनांक 27 मई 2020 के तहत मृत घोषित किया गया, जबकि 20 जून 2020 को उनकी जमीन का मालिकाना हक उनकी पत्नी और पुत्र को सौंप दिया गया। उन्होंने तहसील प्रशासन से इस पूरे मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच की मांग करते हुए कहा कि जिन लोगों ने उन्हें कागजों में मृत कर उनकी जमीन से बेदखल किया है, उनके विरुद्ध तत्काल कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
मोहन सिंह ने एक और गंभीर आशंका जताते हुए इस पत्रकार को बताया कि यदि राजस्व विभाग की तरह समाज कल्याण विभाग भी उन्हें मृत मान लेता है, तो उन्हें लगभग एक लाख रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। वर्तमान में उन्हें हर माह 1500 रुपये की वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है, और यदि विभाग ने उन्हें मृतक मान लिया, तो पिछले पाँच वर्षों की पूरी पेंशन राशि की वसूली उनसे की जा सकती है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की जमीन या पेंशन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता, रिकॉर्ड प्रणाली की पारदर्शिता और आम नागरिक की सुरक्षा पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़े करता है। जब एक जीवित व्यक्ति सरकारी दस्तावेज़ों में मृत हो सकता है, तो व्यवस्था की इस भूल की कीमत कौन चुकाएगा—यह सवाल अब पूरे क्षेत्र में गूंज रहा हैं।

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