March 10, 2026

जैविक खेती बनेगी पर्वतीय समृद्धि का आधार — गरुड़ में वैज्ञानिकों, किसानों और समाजसेवियों ने छेड़ी प्राकृतिक कृषि की नई मुहिम


गरुड़, बागेश्वर। उत्तराखण्ड के पर्वतीय अंचलों में कृषि को पुनः उसकी प्राकृतिक और सतत् स्वरूप में स्थापित करने की दिशा में सोमवार को बागेश्वर जनपद के गरुड़ विकासखंड स्थित ग्राम भतड़िया में एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक बैठक का आयोजन किया गया। हितैषी संस्था के तत्वावधान तथा यूकोस्ट के सहयोग से आयोजित इस संवादात्मक कार्यक्रम में क्षेत्र के प्रगतिशील कृषकों, समाजसेवियों, जनप्रतिनिधियों और कृषि विशेषज्ञों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी करते हुए जैविक खेती को जनआंदोलन का स्वर देने का संकल्प लिया।
बैठक का केंद्रीय विषय जैविक खेती और उसके बहुआयामी लाभ रहे। वक्ताओं ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि बीते कुछ दशकों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अनियंत्रित उपयोग ने न केवल भूमि की प्राकृतिक उर्वरता को गंभीर रूप से क्षीण किया है, बल्कि मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी दूरगामी दुष्प्रभाव डाले हैं। ऐसे में यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि किसान पारंपरिक एवं प्राकृतिक कृषि पद्धतियों की ओर पुनः लौटें, जिससे मिट्टी की सेहत, पर्यावरण की शुद्धता और मानव जीवन की गुणवत्ता सुरक्षित रह सके।
कार्यक्रम में बागेश्वर जनपद के प्रख्यात कृषक चन्द्र शेखर पांडे, जिन्हें अब तक कृषि क्षेत्र में 70 से अधिक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं, ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि यदि हमें आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित पर्यावरण और शुद्ध अन्न प्रदान करना है, तो रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशक दवाओं से मुक्त खेती ही एकमात्र विकल्प है। उन्होंने कहा कि जैविक खेती केवल उत्पादन की तकनीक नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व का जीवनदर्शन है, जो मानव और प्रकृति के संबंधों को पुनः सुदृढ़ करता है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार चन्द्र शेखर बड़सीला ने अपने विचार रखते हुए कहा कि मनुष्य का भोजन उसके विचारों और व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करता है। इसलिए शुद्ध और प्राकृतिक आहार न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि मानसिक और सामाजिक संतुलन के लिए भी अनिवार्य है।
कृषक व पत्रकार अर्जुन राणा ने अपने संबोधन में कहा कि जैविक खेती के माध्यम से ही हम प्रकृति और मानव के बीच संतुलन को पुनः स्थापित कर सकते हैं। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि वे रासायनिक कृषि से दूर होकर प्राकृतिक पद्धतियों को अपनाएं, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्वस्थ समाज की भी नींव रखी जा सके।

सभा को सम्बोधित करते हुए कृषि विकास अधिकारी सुंदर कुमार ने सभी किसानों से अपील की कि वे हमेशा अपने कृषि उत्पादन में जैविक खाद का ही प्रयोग करे। उन्होंने पहाड़ के लुप्तप्राय फसलों झिंगोर, कौड़ि मंडुवा आदि के उत्पादन पर भी जोर दिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तराखण्ड सरकार के कृषि अनुसंधान केंद्र के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. डी.एस. रावत ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तराखण्ड अपनी भौगोलिक और पारिस्थितिक विशेषताओं के कारण पूरे देश में जैविक खेती का प्रमुख केंद्र बनकर उभर सकता है। उन्होंने बताया कि जैविक उत्पादों की वैश्विक बाजार में भारी मांग है और ये उत्पाद सामान्य कृषि उत्पादों की तुलना में सात से आठ गुना अधिक मूल्य पर बिकते हैं, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
कार्यक्रम का संचालन हितैषी संस्था के अध्यक्ष डॉ. किशन राणा के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। उन्होंने अपने संबोधन में किसानों से वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए जैविक पद्धतियों को व्यवहार में उतारने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यदि संगठित और समन्वित प्रयास किए जाएं, तो गरुड़ क्षेत्र को जैविक कृषि के आदर्श मॉडल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
बैठक में उपस्थित किसानों ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए जैविक उत्पादों के बढ़ते बाजार मूल्य, स्वास्थ्यवर्धक गुणों और पर्यावरणीय लाभों पर विस्तार से चर्चा की। प्रतिभागियों ने विश्वास व्यक्त किया कि यदि प्रशासन, वैज्ञानिक संस्थान और किसान मिलकर एक साझा मंच पर कार्य करें, तो पर्वतीय कृषि को नई दिशा, नई पहचान और स्थायी समृद्धि प्राप्त हो सकती है।
कार्यक्रम में पूर्व प्रधान हरीश जीना, गोविंदी जीना, शिक्षक शेर सिंह जीना, अमर सिंह, गोपाल सिंह जीना, तारा सिंह जीना, पूर्व प्रधान सुरेश राम, सोनी बरोलिया, पूर्व प्रधान खीम सिंह जीना, नारायण सिंह जीना, पूर्व शिक्षक खीम सिंह भएड़ा सहित क्षेत्र की अनेक महिलाओं और दर्जनों ग्रामीणों ने सक्रिय सहभागिता दर्ज कराई।