हिमालय का सच्चा मित्र ‘डेविड भाई’ नहीं रहे — पर्यावरण, भूगोल और गांधीवादी जीवन मूल्यों का एक युग हुआ अवसान
कौसानी (बागेश्वर)। हिमालयी पर्यावरण, भूगोल और गांधीवादी जीवन मूल्यों के प्रति समर्पित व्यक्तित्व डेविड जेरार्ड हॉपकिंस, जिन्हें पूरे क्षेत्र में स्नेहपूर्वक ‘डेविड भाई’ के नाम से जाना जाता था, अब इस दुनिया में नहीं रहे। सोमवार तड़के सुबह लगभग 4 बजे 78 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन का समाचार मिलते ही देशभर के सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरण प्रेमियों, भूगोलविदों और गांधीवादी विचारधारा से जुड़े लोगों में गहरा शोक व्याप्त हो गया। पिछले पाँच दशकों में हिमालयी क्षेत्र में हुए पर्यावरणीय परिवर्तनों के वे एक जीवंत साक्षी रहे और अपने ज्ञान, अनुभव तथा संवेदनशील दृष्टि से उन्होंने अनगिनत लोगों को प्रेरित किया।
डेविड भाई ने अपना अधिकांश जीवन उत्तराखंड के कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम में बिताया, जहाँ उन्होंने दशकों तक सेवा करते हुए शिक्षा, पर्यावरण चेतना और गांधीवादी जीवन पद्धति के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शांत स्वभाव, सादगीपूर्ण जीवनशैली और कार्य के प्रति अदम्य निष्ठा के कारण वे आश्रम परिवार, विद्यार्थियों और क्षेत्र के लोगों के बीच अत्यंत सम्मान और स्नेह के पात्र बने रहे।
9 दिसंबर 1947 को लंदन में विनीफ्रेड और ग्लिन हॉपकिंस के घर जन्मे डेविड भाई ने मिडलसेक्स और केंट के विद्यालयों में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने 1969 में ब्रिस्टल विश्वविद्यालय से भूगोल में बीए ऑनर्स तथा 1971 में लीड्स विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट सर्टिफिकेट ऑफ एजुकेशन प्राप्त किया। पहाड़ों और यात्राओं के प्रति उनके गहरे आकर्षण ने उन्हें पहले वेल्स, स्कॉटलैंड और नॉर्वे तक पहुँचाया और अंततः 1969 में भारत की यात्रा पर ले आया। महात्मा गांधी के शिक्षा संबंधी आदर्शों से प्रेरित होकर वे 1972 में पहली बार कौसानी पहुँचे और 1981 में स्थायी रूप से यहीं बस गए। कुछ दशक पूर्व उन्होंने भारत की नागरिकता भी ग्रहण कर ली थी।
हालाँकि उनका जन्म लंदन में हुआ था, किंतु उनके जीवन का वास्तविक विस्तार हिमालय और यहाँ के लोगों के बीच ही हुआ। भूगोल के गंभीर अध्येता होने के कारण प्रकृति, पर्यावरण तथा उनके संरक्षण और विनाश के आयामों पर उनकी दृष्टि अत्यंत गहरी थी। लक्ष्मी आश्रम में बिताए उनके लंबे वर्षों ने उनके समर्पण और लगाव की अमिट गवाही दी। उन्होंने इस क्षेत्र की प्रकृति, समाज और जीवन को न केवल समझा बल्कि उसे पूरी आत्मीयता से अपनाया।
लक्ष्मी आश्रम परिवार के साथ उनका संबंध केवल औपचारिक नहीं था, बल्कि उसमें गहरा अपनापन और आत्मीयता समाहित थी। आश्रम द्वारा संचालित खादी दुकानों और खादी के प्रसार में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आश्रम के कार्यों को व्यवस्थित और अनुशासित ढंग से संचालित करने में उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण था कि उन्हें आश्रम का एक मजबूत स्तंभ माना जाता था।
यात्राओं और अन्वेषण के प्रति उनका आकर्षण बचपन से ही स्पष्ट था। युवावस्था में वे अक्सर अकेले पहाड़ों में निकल जाते थे, मानो किसी अनदेखी खोज की तलाश में हों। सरला बहन के कार्यों के बारे में जानने के बाद उनका मन भारत आने के लिए व्याकुल हो उठा। 1970 के दशक में वे सड़क मार्ग से तुर्की, अफगानिस्तान और खैबर दर्रे से होते हुए भारत पहुँचे। उस ऐतिहासिक यात्रा की अनेक तस्वीरें आज भी उनके पास मौजूद थीं, जिन्हें एक अमूल्य विश्व धरोहर के रूप में देखा जाता है।
भारत में बसने के बाद उन्होंने स्वयं को पूरी तरह भारतीय जीवन में ढाल लिया। उनके पास वर्षों से प्रतिदिन की वर्षा, बर्फबारी और तापमान का अत्यंत व्यवस्थित और सटीक आँकड़ा संग्रहित रहा, जो हिमालयी पर्यावरण अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। पहाड़ों की यात्राओं पर आधारित उनके संस्मरण भी ज्ञानवर्धक और प्रेरक थे, हालांकि उनका पूर्ण उपयोग अभी तक नहीं हो पाया है। उन्होंने सरला बहन की जीवनी का अंग्रेजी अनुवाद कर उनके विचारों को देश-विदेश तक पहुँचाने का भी महत्वपूर्ण कार्य किया।
राधा दीदी के साथ मिलकर उन्होंने लक्ष्मी आश्रम के संचालन में उल्लेखनीय योगदान दिया। समय की पाबंदी, छात्राओं को पढ़ाना, कार्यालय के कार्यों को सुव्यवस्थित करना और शाम की प्रार्थना में नियमित सहभागिता—ये सब उनकी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा रहे। हाल के वर्षों में स्वास्थ्य और आयु के कारण उनकी गति कुछ धीमी अवश्य हुई, किंतु अपने दायित्वों के प्रति उनकी निष्ठा कभी कम नहीं हुई।
आज भले ही डेविड भाई हमारे बीच प्रत्यक्ष रूप में उपस्थित नहीं हैं, किंतु उनका विचार, उनका कार्य और उनका सादगीपूर्ण जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बना रहेगा। हिमालय की गोद में बीता उनका जीवन इस बात का सशक्त उदाहरण है कि समर्पण, सादगी और प्रकृति के प्रति प्रेम किसी भी व्यक्ति को सीमाओं से परे एक वैश्विक नागरिक बना सकता है।
क्षेत्र के समस्त गांधीवादी, सामाजिक कार्यकर्ताओ, लक्ष्मी आश्रम व बसन्त पांडे सहित सभी सर्वोदयी विचारधारा के लोगो ने उन्हें अंतिम विदाई दी हैं।
