हिमालय के सच्चे मित्र ‘डेविड भाई’ को अंतिम विदाई
कौसानी , बागेश्वर । उत्तराखंड के हिमालयी अंचल से एक ऐसी खबर आई है जिसने पर्यावरण प्रेमियों, गांधीवादी विचारधारा से जुड़े लोगों और स्थानीय समुदाय को गहरे शोक में डुबो दिया है। कौसानी में दशकों तक रहकर प्रकृति, समाज और मानवता की सेवा करने वाले ‘डेविड भाई’ अब इस दुनिया में नहीं रहे। इंग्लैंड में जन्मे लेकिन भारत को अपना कर्मभूमि बनाने वाले डेविड हॉपकिंस का अंतिम संस्कार सरयू-गोमती संगम के श्मशान घाट पर हिंदू रीति-रिवाजों के साथ किया गया, जहां उनकी बेटी ने मुखाग्नि देकर उन्हें अंतिम विदाई दी।
बागेश्वर और कौसानी के लोगों के लिए ‘डेविड भाई’ केवल एक विदेशी नागरिक नहीं थे, बल्कि हिमालय की प्रकृति और यहां की संस्कृति के सच्चे संरक्षक और मित्र के रूप में जाने जाते थे। 78 वर्ष की आयु में उनके निधन की खबर जैसे ही क्षेत्र में फैली, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरण प्रेमियों और गांधीवादी विचारधारा से जुड़े लोगों में शोक की लहर दौड़ गई।
डेविड हॉपकिंस मूल रूप से इंग्लैंड के निवासी थे, लेकिन 1970 के दशक में लंबी यात्राओं के दौरान उनका मन भारत और विशेष रूप से हिमालय की गोद में बस गया। गांधीवादी विचारों से प्रभावित होकर वे उत्तराखंड के कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम से जुड़े और यहीं से उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा समाज सेवा, पर्यावरण संरक्षण और शिक्षा के कार्यों को समर्पित कर दिया।
कहा जाता है कि युवावस्था से ही उन्हें पहाड़ों और यात्राओं का गहरा आकर्षण था। इसी जिज्ञासा ने उन्हें यूरोप से होते हुए तुर्की, अफगानिस्तान और खैबर दर्रे के रास्ते भारत तक पहुंचाया। बाद में हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता और यहां के लोगों की सरलता ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने यहीं बसने का निर्णय ले लिया और अंततः भारतीय नागरिकता भी ग्रहण कर ली।
सबसे मजेदार बात यह थी कि वे हमेशा फर्राटेदार कुमाऊनी भाषा बोल लेते थे।
कौसानी के लक्ष्मी आश्रम में रहते हुए उन्होंने शिक्षा, पर्यावरण जागरूकता और गांधीवादी जीवनशैली के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आश्रम के प्रशासनिक कार्यों को व्यवस्थित करना, विद्यार्थियों को पढ़ाना, कार्यालय संचालन में सहयोग देना और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था। शांत स्वभाव, सादगीपूर्ण जीवन और प्रकृति के प्रति अटूट प्रेम ने उन्हें आश्रम परिवार और क्षेत्रीय लोगों के बीच अत्यंत सम्मानित बना दिया।
हिमालयी पर्यावरण के अध्ययन में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। पिछले पांच दशकों में पहाड़ों के बदलते मौसम, वर्षा, तापमान और पर्यावरणीय परिवर्तनों का उन्होंने बेहद व्यवस्थित और सटीक आंकड़ों के साथ दस्तावेजीकरण किया, जो हिमालयी पर्यावरण के अध्ययन के लिए आज भी महत्वपूर्ण माना जाता है। पहाड़ों की यात्राओं पर आधारित उनके संस्मरण और अनुभव भी बेहद प्रेरणादायक माने जाते हैं।
आज 78 वर्ष की आयु में उनके निधन के बाद मंगलवार को आश्रम से उनकी अंतिम यात्रा निकाली गई। बड़ी संख्या में आश्रम परिवार, सामाजिक कार्यकर्ता और क्षेत्रीय लोग इस अंतिम यात्रा में शामिल हुए। सरयू-गोमती संगम के श्मशान घाट पर हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी बेटी, जो इंग्लैंड में रहती हैं, पिता के निधन की खबर सुनते ही कौसानी पहुंचीं और उन्होंने ही चिता को मुखाग्नि देकर पिता को अंतिम विदाई दी।
इस दौरान उपस्थित लोगों की आंखें नम थीं। सभी ने ‘डेविड भाई’ को एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में याद किया जिसने अपना पूरा जीवन हिमालय, प्रकृति और समाज की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
आज भले ही डेविड भाई शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन, उनके विचार और प्रकृति के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अमिट स्रोत बना रहेगा।
