March 26, 2026

दियारी मेले की अलौकिक आस्था: चैत्र अष्टमी पर कोट भ्रामरी मंदिर में उमड़ा श्रद्धा, तप और परंपरा का विराट सागर


गरुड़ (बागेश्वर)। चैत्र माह की पावन अष्टमी के शुभ अवसर पर कोट भ्रामरी मंदिर एक बार पुनः आस्था, अध्यात्म और लोकपरंपरा के दिव्य संगम का साक्षी बना। प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा, जिसने पूरे क्षेत्र को भक्ति की अनुपम आभा से आलोकित कर दिया।
इस प्राचीन सिद्धपीठ का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतनी ही इसकी लोकमान्यताएं भी गहन आस्था से ओत-प्रोत हैं। पौराणिक विश्वासों के अनुसार, यह धाम मां भ्रामरी की तपस्थली है, जहां देवी ने भंवरे के रूप में दुष्ट शक्तियों का संहार किया था। इसी कारण यह स्थल ‘भ्रामरी’ नाम से विख्यात हुआ और कालांतर में यह क्षेत्र साधकों की साधना भूमि तथा जनआस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।
विशेष रूप से इस मेले की सबसे अद्भुत और श्रद्धा से परिपूर्ण परंपरा सप्तमी की रात्रि को देखने को मिलती है, जिसे स्थानीय स्तर पर “दियारी मेला” के नाम से जाना जाता है। इस रात्रि निःसन्तान महिलाएं संपूर्ण रात अपने हाथों में जलता हुआ दीपक लेकर खड़ी रहकर कठोर तपस्या करती हैं। यह दृश्य केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था की चरम अभिव्यक्ति है, जहां तप, विश्वास और समर्पण का अनूठा संगम दिखाई देता है। जनश्रुति है कि इस कठिन व्रत एवं साधना से प्रसन्न होकर मां भगवती निःसन्तान महिलाओं को पुत्र रत्न का वरदान प्रदान करती हैं। यही कारण है कि दूर-दूर से महिलाएं इस दियारी मेले में सम्मिलित होकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु यह तप करती हैं।
चैत्र अष्टमी के दिन मंदिर में दर्शन हेतु हजारों श्रद्धालु पहुंचे, जिन्होंने विधिवत पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण की कामना की। “जय मां भ्रामरी” के उद्घोष से मंदिर परिसर गूंज उठा, जिससे वातावरण पूर्णतः भक्तिमय हो गया।
इस अवसर पर लगने वाला भव्य मेला क्षेत्रीय संस्कृति का जीवंत दर्पण बनकर सामने आया। पारंपरिक हस्तशिल्प, स्थानीय व्यंजन और ग्रामीण उत्पादों की सजी-धजी दुकानों ने मेले की शोभा बढ़ाई, वहीं बच्चों और युवाओं के लिए झूले एवं मनोरंजन के विविध साधनों ने उल्लास को चरम पर पहुंचा दिया।
प्रशासन द्वारा मेले के सफल आयोजन हेतु व्यापक प्रबंध सुनिश्चित किए गए थे। सुरक्षा व्यवस्था से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं और यातायात नियंत्रण तक हर स्तर पर सजगता दिखाई दी। स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों और नागरिकों का सहयोग भी उल्लेखनीय रहा।
इस प्रकार, कोट भ्रामरी मंदिर का यह दियारी मेला केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था की अग्नि में तपकर साकार होती उम्मीदों, लोकविश्वासों और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत प्रतीक बनकर उभरता है। यहां उमड़ती भीड़ इस सत्य की पुष्टि करती है कि जब विश्वास अडिग हो, तो परंपराएं केवल निभाई नहीं जातीं—वे पीढ़ियों तक जीवित रहती हैं।