रक्षाबंधन पर महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा का स्वागत, लेकिन वरिष्ठ नागरिकों ने उठाए सवाल
जब उत्तर प्रदेश में 60 वर्ष की उम्र में महिलाओं-पुरुषों को मिल रही सुविधा, तो उत्तराखंड में भेदभाव क्यों?
अर्जुन राणा
वरिष्ठ नागरिक बोले—पुरुषों ने आखिर ऐसा क्या गलत कर दिया कि उन्हें इस सुविधा से दूर रखा गया? समान नियम लागू नहीं हुआ तो आंदोलन की चेतावनी
बागेश्वर । रक्षाबंधन के अवसर पर सरकार की ओर से 60 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को उत्तराखंड परिवहन निगम की बसों में निःशुल्क यात्रा की सुविधा देने तथा देहरादून में 10 पिंक ई-बसें संचालित करने की घोषणा का रोडवेज कर्मचारी संयुक्त परिषद ने स्वागत किया है। परिषद ने इसे महिलाओं के सशक्तिकरण, सम्मान और सुरक्षित परिवहन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
हालांकि, सरकार के इस फैसले के साथ ही वरिष्ठ नागरिकों के बीच एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है—जब उत्तर प्रदेश में 60 वर्ष की आयु पूरी करने वाले वरिष्ठ नागरिकों को परिवहन सुविधा में रियायत का प्रावधान है, तो उत्तराखंड में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं?
वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि सरकार महिलाओं को सुविधा दे, इसका वे विरोध नहीं करते, लेकिन समान उम्र के पुरुषों को इस सुविधा से बाहर रखना किस आधार पर उचित है? उम्र बढ़ने के साथ पुरुष और महिला दोनों की आर्थिक क्षमता, स्वास्थ्य और परिवहन संबंधी जरूरतें प्रभावित होती हैं। ऐसे में सुविधा का आधार केवल लिंग नहीं, बल्कि वरिष्ठ नागरिक की आयु और आवश्यकता भी होनी चाहिए।
‘महिलाओं को सुविधा का स्वागत, लेकिन पुरुषों से भेदभाव क्यों?’
वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही नीति में समानता का सिद्धांत भी लागू होना चाहिए। उनका सीधा सवाल है—“पुरुषों ने क्या गलत काम कर दिया है, जो उन्हें इसी उम्र में मिलने वाली सुविधा से वंचित किया जा रहा है?”
उनका कहना है कि 60 वर्ष की उम्र के बाद पुरुष भी वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में आते हैं। उन्हें भी अस्पताल, धार्मिक स्थलों, पारिवारिक कार्यों और अन्य जरूरी कामों के लिए बसों में सफर करना पड़ता है। कई वरिष्ठ नागरिकों की नियमित आय का स्रोत भी नहीं रहता। ऐसे में किराये का बोझ उनके लिए भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
वरिष्ठ नागरिकों के मुताबिक सरकार यदि वास्तव में बुजुर्गों के सम्मान और सामाजिक सुरक्षा की बात करती है तो महिलाओं और पुरुषों के लिए समान उम्र पर समान परिवहन सुविधा का प्रावधान होना चाहिए।
उत्तर प्रदेश का उदाहरण देकर उठाया सवाल
वरिष्ठ नागरिकों ने उत्तर प्रदेश की व्यवस्था का हवाला देते हुए उत्तराखंड सरकार से सवाल किया है कि जब पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में 60 वर्ष की आयु से वरिष्ठ नागरिकों को परिवहन संबंधी रियायत की व्यवस्था लागू है, तो उत्तराखंड में 60 वर्ष की आयु वाले नागरिकों के लिए ऐसी सुविधा क्यों नहीं हो सकती?
उनका कहना है कि उत्तराखंड एक पर्वतीय राज्य है, जहां बड़ी संख्या में लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी कार्यालयों, बाजारों और अन्य जरूरी कार्यों के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। पहाड़ों में सार्वजनिक परिवहन ही आम जनता और विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों का बड़ा सहारा है। ऐसे में वरिष्ठ नागरिकों के लिए बस किराये में राहत का महत्व मैदानी राज्यों से भी अधिक है।
रोडवेज कर्मचारी संयुक्त परिषद ने भी रखी अपनी मांग
रोडवेज कर्मचारी संयुक्त परिषद के उप महामंत्री विपिन बिजल्वाण ने कहा कि संगठन लंबे समय से महिलाओं के लिए निःशुल्क यात्रा की मांग उठाता रहा है। उनका कहना है कि इस सुविधा से मातृशक्ति को राहत मिलने के साथ यात्रीभार बढ़ सकता है और इससे निगम की आय में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। परिषद ने भविष्य में इस सुविधा का दायरा बढ़ाकर सभी महिलाओं को शामिल करने की उम्मीद जताई है।
परिषद ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, परिवहन मंत्री प्रदीप बत्रा और प्रबंध निदेशक रीना जोशी का आभार भी जताया है।
लेकिन अब वरिष्ठ नागरिकों की ओर से उठ रही मांग यह है कि महिलाओं के साथ-साथ 60 वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों को भी समान सुविधा दी जाए।
‘वरिष्ठ नागरिकों को बांटकर नहीं, बराबरी से देखे सरकार’
वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि बुजुर्गावस्था किसी एक लिंग की समस्या नहीं है। उम्र बढ़ने के साथ महिला हो या पुरुष, दोनों को स्वास्थ्य, आर्थिक और आवागमन से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
उनका कहना है कि यदि सरकार महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा को महिला सशक्तिकरण का कदम मानती है तो वरिष्ठ पुरुषों को समान सुविधा देना वरिष्ठ नागरिक सम्मान और सामाजिक न्याय का कदम होगा।
उन्होंने सरकार से मांग की है कि रक्षाबंधन पर घोषित इस सुविधा की तर्ज पर उत्तराखंड परिवहन निगम की बसों में 60 वर्ष से अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों—महिला और पुरुष—के लिए समान यात्रा सुविधा अथवा किराये में पर्याप्त छूट का प्रावधान किया जाए।
पर्वतीय क्षेत्रों में नई बसों की भी मांग
परिषद ने उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग जैसे पर्वतीय एवं सीमांत क्षेत्रों में नई बसों का समुचित आवंटन करने की मांग भी उठाई है। परिषद का कहना है कि पर्वतीय मार्गों पर पर्याप्त बसें संचालित होने से स्थानीय जनता, छात्र-छात्राओं और कर्मचारियों को सुगम परिवहन मिल सकेगा। इससे यात्रियों की संख्या बढ़ेगी और परिवहन निगम की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो सकती है।
समानता नहीं मिली तो आंदोलन की चेतावनी
वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि उनकी मांग किसी वर्ग के अधिकार छीनने की नहीं, बल्कि समान अधिकार दिए जाने की है। वे महिलाओं को मिलने वाली सुविधा के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि चाहते हैं कि उसी आधार पर वरिष्ठ पुरुषों को भी राहत दी जाए।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि सरकार ने इस मांग पर गंभीरता से विचार नहीं किया और महिला एवं पुरुष वरिष्ठ नागरिकों के लिए समान नियम लागू नहीं किया, तो आने वाले समय में सरकार को वरिष्ठ नागरिकों की ओर से जबरदस्त आंदोलन का सामना करना पड़ सकता है।
अब निगाहें सरकार पर हैं कि वह इस सवाल को केवल एक मांग मानकर टालती है या फिर ‘60 साल की उम्र—समान सुविधा’ के सिद्धांत को उत्तराखंड में लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाती है।
वरिष्ठ नागरिकों का सवाल बेहद सीधा है—जब उम्र एक है, जरूरतें एक जैसी हैं और नागरिकता भी एक है, तो सुविधा में अंतर क्यों?
